दयानन्द बावनी (सम्पूर्ण) कवि दूलेराय काराणी वन्दु मात सरस्वती सुखदात्री सुखकंद। वंदन भगवती भारती दिया है दयानन्द।। ०१- ओम्कार महिमा अरूपी अकाम परिपूर्ण प्रेम-धर्म-धाम। आदि में अनादि नाम एक ओंम्कार का।। अखण्ड अखेद…
०१- ओम्कार महिमा दयानन्द बावनी कवि दूलेराय काराणी वन्दु मात सरस्वती सुखदात्री सुखकंद। वंदन भगवती भारती दिया है दयानन्द।। ०१- ओम्कार महिमा अरूपी अकाम परिपूर्ण प्रेम-धर्म-धाम। आदि में अनादि नाम एक ओंम्कार का।।…
०२- अवतार ०२- अवतार धन्न धर्मभूमि धन्न टंकारा की धरा धन्न। जहां जन्म धरे धर्म धुरि के टंकारी है।। उन्नीसवी सदी धन्न अस्सीवे सुवर्ष धन्न। आषाढी संध्या हो धन्न दिन मनोहारी है।।…
०३- ज्ञानरात्रि ०३- ज्ञानरात्रि टंकारे में भयो भव्य क्रान्ति को अमोघ योग। महाशिवरात्री को महान पर्व आयो है।। शंकर की शक्ति भक्ति सुनी भक्तमण्डल की। मुक्ति की उक्ति में मूलशंकर मोहायो है।।…
०४- शंकर को मूल ०४- शंकर को मूल रात चली जात ढली जात आंख भक्तन की। नींद ना सोहात नैन में मूल शंकर को।। शंकर के लिंग पे मचाई धूम मूषकों ने। भेद कछु…
०५- यही त्रिपुरारी है ? ०५- यही त्रिपुरारी है ? कहा यही देवन को देव महादेव आप ? यही नीलकण्ठ वैकुण्ठ को विहारी है।। अनाथों को नाथ आप ऐसो है अनाथ डाक। डमरू के साथ…
०६- प्रस्थान ०६- प्रस्थान गांव छोड़ा घर छोड़ा जागीर सों जर छोड़ा। सुंदर सुभोजन मधुरतर छोड़ा है।। धन छोड़ा धाम छोड़ा छोड़ा सुखदाता माता- पिता भ्राता भगिनी का नाता तूने तोड़ा है।।…
०७- संन्यास ०७- संन्यास दूर देहाभ्यास किया सानन्द संन्यास लिया। तीव्र आत्मप्यास वेदाभ्यास ते बुझाय के।। भए मूलशंकर से दयानन्द सरस्वती। योग की जगाई ज्योत हिमाद्रि को जाय के।। हिंसक पशुन बीच…
०८- गुरु की शरण में ०८- गुरु की शरण में भारत की एक भव्य विभूति विरजानन्द। गुरुवर शरण में दयानन्द आयो है।। प्रज्ञाचक्षु गुरुजी को क्रोधी स्वभाव सह्यो। शिष्य को सुधर्म सहिष्णुता अपनायो है।। वेदधर्मोद्धार-व्रत…
०९- देश की दुर्दशा ०९- देश की दुर्दशा भारत भूमि में वेद धूनि न सुनाई कहीं। सुना बाईबल सुनाईं आयतें कुरान की।। ईसु की ईमानदारी पादरी पडान लागे। संग में सुनान लगीं आवाजें अजान…
१०- आर्यावर्त में अनाचार १०- आर्यावर्त में अनाचार सारे आर्यावर्त में न आर्यत्व को रह्यो अंश। धर्म कर्म ध्वंस को अघोर काल आयो है।। आतंक उत्ताप अभिशाप के सन्ताप साथ। पाप को अमाप ताप…
११- ब्राह्मण ११- ब्राह्मण ब्राह्मणों ने कीनी ब्रह्मविद्या को विदेशपार। अविद्या अज्ञान को अंधार जापे आयो है।। विद्यादान ध्यान-धर्म ब्रह्म को न जान्यो मर्म। पाचकों को कर्म एक विप्र-मनभायो है।। वेद को…