०१५ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (१२)

प्रथम समुल्लास भाग (१२) द्वैत भाव प्रभु में नहीं आवे, ताँते वह ‘अद्वैत’ कहावे। वह कैवल्य रूप एकाकी, कहूं द्विता दीखे नहीं ताकी। नाँहीं उसका कोई सजाति, नाँहीं कोई अन्य…

०१४ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (११)

प्रथम समुल्लास भाग (११) दोहा देव शब्द के अर्थ जो, उहि देवी के जान। तीन लिंग में ना है, त्रैलिङ्गी भगवान।। चौपाई जैसे ‘ब्रह्म’ ‘चिति’ अरु ‘ईश्वर’, तीन लिंग संज्ञी…

०१३ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (१०)

प्रथम समुल्लास भाग (१०) तैतिरि ऋषि यह वचन बखाना, नाम अनन्त प्रभु गुणा गाना। सकल पदारथ मँह ‘सत्’ कहिये, सत मँह रहे ‘सत्य’ प्रभु गहिये। जड़ जंगम जाने भगवाना, ताँते …

०१२ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (९)

प्रथम समुल्लास भाग (९) ‘चदि’ आल्हादे ‘चंद्र हु सिद्धि, चंद्र शब्द की अर्थ प्रसिद्धि। सुख दाता आनन्द सरूपा, चन्द्र नाम परमेश अनूपा।   ‘मगि’ गत्यर्थे मंगल नामा, मंगलकारक वह भगवाना। ‘बुध्’…

०११ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (८)

प्रथम समुल्लास भाग (८) सो प्रभु सब का जाननहारा, उसी देव का सकल पसारा। ‘कुबि’ आच्छादन बना कुबेरा, छाया विश्व माँहि प्रभु मेरा। ‘पृथु’ विस्तारे ‘पृथिवी’ गहिये, विस्तारक ईश्वर कँह…

०१० स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (७)

प्रथम समुल्लास भाग (७) प्रश्न संज्ञा ‘मित्र’ सखा को कहिये, ईश अर्थ मंह क्यों पुन गहिये। इन्द्रादिक देवन के कर्मा, जग विख्यात सबहुं के धर्मा। ग्रहण करें साधारण अर्था, ईश…

००९ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (६)

प्रथम समुल्लास भाग (६) स्तुति प्रशंसा और उपासन, प्रभु के करें भक्त थित आसन। जिंह उत्तम गुण कर्म स्वभावा, तिंह पर उपजे श्रद्धा भावा।। पारब्रह्म सर्वोत्तम ईश्वर, सब सों ऊँचा…

००८ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (५)

प्रथम समुल्लास भाग (५) ओंकार अर्थ का विचार चौपाई ‘राट’ ‘वि’ उपसर्ग समीपे, चमक दमक धात्वर्थ प्रदीपे। ‘क्विप्’ प्रत्यय पुन साथ लगायें, एहि विधि शब्द विराट् बनायें।। विविध जगत् प्रभु…

००६ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (३)

प्रथम समुल्लास भाग (३) सब से बड़ा महाप्रभु मेरा, ब्रह्म नाम ताते प्रभु केरा। ओ३म् नाम ताका है भाई, अविनाशी, नहीं वह बिनसाई।। उसका सकल विश्व पर शासन, सिमरहु वाको…

००५ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (२)

प्रथम समुल्लास भाग (२) ओं खम्ब्रह्मं।।१।। – यजुर्वेद अध्याय ४०। मन्त्र १७ ओमित्येतदक्षरमुद्रीथमुपासीत।।२।। – छान्दोग्य उपनिषत्। ओमित्येतक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानम्।।३।।     – माण्डूक्य। सर्वें वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं…

००४ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (१)

ओ३म् सच्चिदानन्देश्वराय नमो नमः सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत प्रथम समुल्लास भाग (१) ओ३म् शन्नो मित्रः शं वरुणः शन्नो भवत्वर्यमा। शन्नऽइन्द्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः।। नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव…

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