००९ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (६) December 9, 2019 By Arun Aryaveer Download प्रथम समुल्लास भाग (६) स्तुति प्रशंसा और उपासन, प्रभु के करें भक्त थित आसन। जिंह उत्तम गुण कर्म स्वभावा, तिंह पर उपजे श्रद्धा भावा।। पारब्रह्म सर्वोत्तम ईश्वर, सब सों ऊँचा वह जगदीश्वर। उसके तुल्य न कोई देवा, विश्व करे उस प्रभु की सेवा।। गुण अनन्त ईश्वर मँह जेते, नहीं जीव प्रकृति में तेते। ईश्वर दाता अरु सत्कर्मा, तांते ईश्वर पूजन धर्मा।। अन्य देव ब्रह्मादिक सारे, ईश उपासक प्रभु के प्यारे। शेष बहुत से दैत्य रु दानव, ऊँच नीचे सब विधि के मानव।। सबने कीनी ईश्वर पूजा, अन्य देव पूजा नहीं दूजा। पुण्य पाप के फल का दाता, सो ईश्वर ‘अर्यमा’ कहाता।। ‘ऋ’ गति प्रापण अर्थ विधाता, ‘यत्’ प्रत्यय तिस पाछे आता। एहि विधि शब्द अर्थ बन जावे, धातु पाछे माङ् लगावे।। लगे ‘कनिन्’ प्रत्यय जब भाई, सिद्ध ‘अर्यमा’ पद हो जाई। ‘इदि’ धातु है ‘परमैश्वर्ये’, ‘रन्’ प्रत्यय तिस पाछे धरिये।। ‘इन्द्र’ शब्द ईश्वर का वाचक, वह दानी दुनियाँ सब याचक। ‘पा’ रक्षण ‘डति’ प्रत्यय लागे, राखहु बृहत् शब्द के आगे।। होय बृहत् के ‘त्’ को लोपा, ‘सुट्’ का आगम संग अरोपा। शब्द बृहस्पति यूँ निर्माना, सब सों बड़ा प्रभु भगवाना।। ‘विषलृ’ धातु अर्थ वियापति, ‘विष्णु’ शब्द की सिद्धि प्रापति। व्यापक जगत चराचर अन्दर, सकल विश्व विष्णु को मंदर।। बल विक्रम मंह ईश महाना, नाम ‘उरुक्रम’ प्रभु का जाना। परम पराक्रम युत भगवाना, सब का सखा सहायक प्राना।। सुख स्वरूप सुखदायक स्वामी, सर्वोत्तम न्यायी हितकामी। सुख संचारक सब का दाता, परमैश्वर्यवान् सुख नाता।। अधिष्ठान अरु महा महाना, व्यापक विष्णु नित कल्याण। करे प्रभु कल्याण हमारा, जिसका जग में सकल पसारा।। ‘बृह’ ‘बृहि’ वृद्धौ दो धातुन का, ब्रह्म शब्द वाचक निर्गुन का। जाको बल ओर शक्ति अनन्ता, जिसका पावें आदि न अन्ता।। पारब्रह्म प्राणों से प्यारा, नमस्कार तोहि बारम्बारा। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म परमेश्वर, हे अन्तर्यामी सर्वेश्वर। तोहे ब्रह्म प्रतक्ख बखानूं, ओत प्रोत व्यापक तोहे जानूं। वेद कथित आज्ञा जो तोरी, वह जीवन की चर्या मोरी।। जग में उसका करूँ प्रचारा, त्योंही अपना रखूं आचारा।। सत्य करूँ मनसा और वाचा, रहूं भक्ति मंह तोरी राचा।। हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजे, सदा सत्य बोलूं वर दीजे। तेरी आज्ञा पालन धर्मा, नहीं पाले तो होय अधर्मा।। रक्षा कर रक्षा कर मेरी, यही प्रार्थना तव जन केरी। ओ३म् शांति शांति प्रभु शांति, देहु शांति मोको सब भाँति।। आत्मिक दैहिक भौतिक सारे, तोरि दया त्रय ताप निवारे। आत्मिक अरु शारीरिक तापा, यह जानहु आध्यात्मिक पापा।। राग द्वेष आदिक अज्ञाना, ज्वर पीड़ा जैसे दुःख नाना। दूसर है आधिभौतिक क्लेशा, सिंह व्याघ्र रिपु कुपित नरेशा।। अधिदैविक दुःख दैव अधीना, दैव कोप सों दूभर जीना। अनावृष्टि अतिवृष्टि तापा, मन इन्द्रिय को हो संतापा।। त्रिविध ताप से प्रभु बचाए, तेरो भक्त शरण मँह आए। शुभ कर्मों में मुझे लगाओ, दया करो निज हाथ उठाओ।। तुम हो प्रभु कल्याण सरूपा, तुम हो सब भूपन के भूपा। करो प्रकाश हमारे मन में, जो तुम चाहो तारो क्षण में।। काव्यरचना : आर्यमहाकविपं. जयगोपालजी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)