०२७ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (५) तृतीय समुल्लास भाग (५) दोहा देव यज्ञ नित हवन कर, ब्रह्म यज्ञ पश्चात। अग्नि होत्र सुख शान्तिमय, सन्ध्या और प्रभात।। प्रातर उदय होय जब भानु, हवन करे करि दीप्त कृशानु।…
०२६ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (४) तृतीय समुल्लास भाग (४) अथ प्राणायाम विधि प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य। – योग० समाधिपादे सू० ३४। चौपाई प्रबल वेगि जस वमनहि वामे, निकसे अन्न थमत नहीं थामे। इह विधि श्वासहि बहिर…
०२५ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (३) तृतीय समुल्लास भाग (३) जो सत चित आनन्द सरूपा, बड़ समरथ भूपन को भूपा। शुद्ध बुद्ध नित मुक्त स्वभावा, दयावन्त असु मूरति न्यावा। जन्म मरण का कष्ट न पावे, निराकार…
०२४ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (२) तृतीय समुल्लास भाग (२) दोहा गुरु जननी गुरु जनक अब, गुरु का धाम स्वधाम। मात पिता नहीं मिल सकें, गुरुकुल में विश्राम।। चौपाई गुरु अर्पण कीनी सन्ताना, बहुरि न उनको…
०२३ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (१) तृतीय समुल्लासः समुल्लास भाग (१) अथाऽध्ययनाऽध्यापनविधिं व्याख्यास्यामः दोहा विद्या शील स्वभाव युत, गुणमणि गुंफित माल। जग में शेभा देत हैं, गुण भूषण से बाल।। चौपाई गुण भूषण बालक के नीके,…
०२६ स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (६) द्वितीय समुल्लासः भाग (6) चौपाई सदा सत्य का करे प्रकाशा, तजे पखण्डिन का विश्वासा। गुरु बतलावें जो शुभ कर्मा, वही कर्म साधन हित धर्मा। कण्ठ करावें दर्शन वेदा, अर्थ सहित…
०२१ स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (५) द्वितीय समुल्लासः भाग (5) दोहा एक वर्ष ते पाँच तक, जननी ही गुरु जान। आठ वर्ष तक जनक पुन, रखे शिशु का ध्यान।। चौपाई नवमें वर्ष धार उपवीता, गुरुकुल माँहि…
०२० स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (४) द्वितीय समुल्लासः भाग (4) छप्पय पुत्र जन्म का उत्सव है, सब ओर बधाई, घर में मंगलचार नार मिल मंगल गाई। होम यज्ञ और दान स्वजन में बंटे मिठाई, जन्म पत्रिका…
०१९ स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (३) द्वितीय समुल्लासः भाग (3) सोरठा लूट रहे दिन रात, धूरत कपटी दुष्ट जन। होवहि कबहु प्रभात, अंधकार कब दूर हो।। चौपाई झाड़ फूँक और जंतर तंतर, कभी न खाली जावे…
०१८ स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (२) द्वितीय समुल्लासः भाग (2) दोहा प्रसव काल बहु कष्ट कर, मातु निबल हो जाय। स्वच्छ स्वस्थ युवती कोई, दूध पिलावे धाय।। चौपाई स्तन पर माता लेप लगावे, दुग्ध स्त्रवण जेहि…
०१७ स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (१) द्वितीय समुल्लासः भाग (१) अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामः मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेद। – शतपथ ब्राह्मण दोहा धन्य धन्य वह वंश है, अहो धन्य सन्तान। गुरु जननी और जनक जिस, मिले ज्ञान…
०१६ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (१३) प्रथम समुल्लास भाग (१३) प्रश्न महाराज इक संशय भारी, यह शंका मम करो निवारी। ग्रन्थारम्भ आपने कीना, प्रथम मंगलाचरण न दीना। ग्रन्थकार हौं देखे जेते, मंगलचार लिखें सब तेते। ग्रन्थ…