०१४ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (११) December 14, 2019 By Arun Aryaveer Download प्रथम समुल्लास भाग (११) दोहा देव शब्द के अर्थ जो, उहि देवी के जान। तीन लिंग में ना है, त्रैलिङ्गी भगवान।। चौपाई जैसे ‘ब्रह्म’ ‘चिति’ अरु ‘ईश्वर’, तीन लिंग संज्ञी जगदीश्वर। जँह ईश्वर पद का अवबोधन ‘देव’, शब्द से तंह सम्बोधन। ‘चिति’ पद नारी लिंग आधारा, ताँते देवी उसे पुकारा। ‘शक्लृ’ धातु ‘शक्ति’ का अर्थक, ‘शक्ति’ ईश्वर नाम समर्थक। निज शक्ति सों जगत रचाया, ताँते ‘शक्ति’ नाम है पाया। ‘श्रि९ा्’ धातु ‘सेवा में’ जानें, श्रि९ा् सो ‘श्री’ पद बना बखाने। सकल विश्व जसु करिहै सेवा, सो प्रभु ‘श्री’ देवन को देवा। ‘लक्ष’ अर्थ दर्शन अरु अंकन, सो लक्ष्मी प्रभु पालहिं रंकन। देखे सारा जगत चराचर, भूचर जलचर और दिवाचर। जग की रूप रु रेख बनावे, ताँते ‘लक्ष्मी’ नाम कहावे। नाना रंग भरे बहुरंगी, रची सृष्टि चित्रित बहुरंगी। सागर पर्वत चाँद सितारे, लक्ष्मी के हैं सकल पसारे। योगी वाके पावहिं दर्सन, प्रेम भरा वाका आकर्सन। दोहा सृ धातु सों सरस्वती, ईश्वर ज्ञान सरुप। प्रभु विद्या का स्त्रोत है, सुन्दर रूप अनूप।। चौपाई सर्व शक्तिमत् वाको नामा, ईश्वर सर्व शक्ति को धामा। शक्ति मान सब काम विधायक, आवश्यक नहीं उसे सहायक। णी९ा् प्रापणे ‘न्याय’ प्रसिद्धा, न्याय शब्द या विधि हो सिद्धा। दोहा प्रत्यक्षादि प्रमाण सों, सत्य सिद्ध जो होय। वा को न्याय बखानिये, पक्षपात नहीं कोय।। चौपाई न्यायवान ताँते प्रभु कहिये, वाको न्याय जगत में पहिये। दय धातु दानादिक वाचक, प्रभु की ‘दया’ सकल जग याचक। भय नाशक वह परम कृपालु, सज्जन रक्षक दीन दयालु। दुष्टन दण्ड देय तत्काला, भक्तन को करिहैं प्रतिपाला। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)