००४ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (१) November 25, 2019 By Arun Aryaveer Download ओ३म् सच्चिदानन्देश्वराय नमो नमः सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत प्रथम समुल्लास भाग (१) ओ३म् शन्नो मित्रः शं वरुणः शन्नो भवत्वर्यमा। शन्नऽइन्द्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः।। नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ऋतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्। ओ३म् शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः।।१।। दोहा ओंकार सब सों प्रथम, मन मँह कीजे ध्यान। जाके चिंतन किये ते, प्राप्त होय कल्यान।। चौपाई ओंकार सर्वोत्तम नामा, अर्थ गंभीर श्रवण अभिरामा। अक्षर त्रय का है समुदाया, पार हुआ भव जिसने ध्याया।। मिले अकार उकार मकारा, बना नाद नाम ओंकारा।। ‘अ’ अक्षर के विस्तृत अर्था, अग्नि विश्व विराट् समर्था। आ पाछे शोभत अक्षर ‘उ’, हिरण्यगर्भ तैजस अरु वायु।। प्राज्ञादित्य ईश त्रय जानें, यह ‘मकार’ के अर्थ पछानें। वेदादिक सत् शास्त्र बखाना, नाम के हैं यह नाना।। प्रश्न – भौतिक अग्नि आदि पदारथ, इनके भी तो नाम यथारत। यह इन्द्रादिक वाचक अर्था, अनिक शक्तियाँ रखें समर्था।। शुण्ठी आदिक वैद्यक माँही, क्या उनके यह वाचक नाहीं। केवल ईश अर्थ क्यों लेवें, शेष पदारथ क्यों तज देवें।। जो मानहिं इन्द्रादिक देवा, फल पाएँ जो करिहें सेवा। उत्तम हैं अरु है परसिद्धि, पूजन ते होवई फल सिद्धि।। उत्तर – ईश्वर अरु प्राकृतिक पदारथ, दोउ पक्षों में नाम सकारथ। केवल देव अर्थ कर ग्रहना, यह तुम्हार अनुचित है कहना।। जो तुम कहते ‘उत्तम देवा, हैं प्रसिद्ध सो कीजे सेवा’। क्या उत्तम परमेश्वर नहीं, फल नाहीं उसकी सेवा माँही।। किसकी प्रभु से अधिक प्रसिद्धि, छिन महँ देवहि ऋद्धि सिद्धि। देव न उसके कोउ समाना, सब देवन का देव महाना। तुल्य नहीं जब उस के कोई, पुन उस से उत्तम को होई। पुन प्रभु के क्यों नाम न गहिये, प्राप्त छोड़ अप्राप्त न लहिये।। सन्मुख धरा पड़ा है भोजन, जो ढूँढे है मूरख सो जन। अग्नि विराट् नाम परसिद्धा, वेद शास्त्र परमान सुसिद्धा।। पारब्रह्म ब्रह्माण्डहु नामा, सत्य उपस्थित सफल सकामा। संभव और उपस्थित त्यागे, असंभूत के पाछे भागे।। नहिं प्रमाण इसमें नहीं युक्ति, बुद्धिमान की नहीं यह उक्ति। जो जैसा जँह होय प्रकरना, उचित अर्थ वहां वैसा करना। जैसे सैंधव शब्द द्विअर्थक, अश्व लवण दोउ अर्थ समर्थक। स्वामी बोले सैंधव लाओ, भोजन करो भाग कर आओ।। सेवक झट घोड़ा ले आवे, वह किंकर निर्बुद्धि कहावे। स्वामी चहे बहिर कर गवना, सेवक सन्मुख धर दे लवना।। सेवक समय न जाननहारा, स्वामी घर सों बहिर निकारा। ताते पहिले देख प्रकरना, उचित पुनः अर्थों का करना।। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)