००७ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (४) November 29, 2019 By Arun Aryaveer Download प्रथम समुल्लास भाग (४) सोरठा इक केवल ओंकार, ईश्वर का निज नाम है। जाप करे संसार, जन्म मरण बंधन कटे।। चौपाई शेष नाम मँह लखें प्रकरना, पुन इनके अर्थों को करना। जहाँ प्रार्थना स्तुति प्रधाना, तहाँ ईश्वर के अर्थ लगाना।। व्यापक शुद्ध दयालु सनातन, सृष्टि कर्ता नित्य पुरातन। या विध जहाँ विशेषण आवें, पारब्रह्म के अर्थ लगावे।। इन मन्त्रों में संज्ञा यावत, लोक पदारथ जाने तावत। पुरुष देव वायु से जेते, भौतिक द्रव्य पदारथ तेते।। उत्पति स्थिति प्रलय जड़ नामा, भौतिक वस्तु गहें हित कामा। सर्वज्ञादि विशेषण सारे, ईश्वर नाम बताने हारे।। सुख दुःख जतन जीव के कहिये, इनते प्रभु के अर्थ न गहिये। जीवहिं जान सदा अल्पज्ञा, ईश विशेष है सर्वज्ञा। ईश अजन्मा अरु अविनाशी, नित्य सत्य अरु स्वयं प्रकाशी। ‘जन्म’ ‘विराट’ आदि यह सारे, जगत जीव के कथने हारे।। ततों विराडजायत विराजो अधि पुरुषः। श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत। तेन देवा अयजन्त।। पश्चाद्भूमिमथो पुरः।। तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भयः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधिभ्योऽन्नम्। अन्नाद्रेतः। रेतसः पुरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः। – ब्रह्माः वल्ली १७ दोहा सुनहु विराटादिक शबद, ईश अर्थ दातार। किस विध अर्थ लगाइये, किस विध करे विचार।। काव्यरचना : आर्यमहाकविपं. जयगोपालजी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)