गुरु ६२. गुरु – जो वीर्यदान से लेके भोजनादि कराके पालन करता है, इससे पिता को ‘गुरु’ कहते हैं और जो अपने सत्योपदेश से हृदय का अज्ञानीरूप अन्धकार मिटा देवे, उसको भी ‘गुरु’…
अतिथि ६३. अतिथि – जिसकी आने और जाने में कोई भी निश्चित तिथि न हो, तथा जो विद्वान् होकर सर्वत्र भ्रमण करके प्रश्नोत्तर के उपदेश से सब जीवों का उपकार करता है, उसको…
पञ्चायतनपूजा ६४. पञ्चायतनपूजा – जीते माता, पिता, आचार्य्य, अतिथि और परमेश्वर का जो यथायोग्य सत्कार करके प्रसन्न करना है, उसको ‘पञ्चायतन पूजा’ कहते हैं।
अपूजा ६६. अपूजा – जो ज्ञानादि रहित जड़ पदार्थ, और जो सत्कार के योग्य नहीं है, उसका जो सत्कार करना है वह ‘अपूजा’ कहाती है।
भावना ६९. भावना – जो जैसी चीज़ हो उसमें विचार से वैसा ही निश्चय करना, कि जिसका विषय भ्रमरहित हो, अर्थात् जैसे को वैसा ही समझ लेना, उसको ‘भावना’ कहते हैं।
पण्डित ७०. पण्डित – जो सत् असत् को विवेक से जानने वाले, धर्म्मात्मा, सत्यवादी, सत्यप्रिय, विद्वान् और सब का हितकारी है, उसको ‘पण्डित’ कहते हैं।
ज्येष्ठकनिष्ठव्यवहार ७३. ज्येष्ठकनिष्ठव्यवहार – जो बड़े और छोटों से यथायोग्य परस्पर मान्य करना है, उसको ‘ज्येष्ठकनिष्ठव्यवहार’ कहते हैं।
सर्वहित ७४. सर्वहित – जो तन, मन और धन से सबके सुख बढ़ाने में उद्योग करना है, उसको ‘सर्वहित’ कहते हैं।