सृष्टि ३७. सृष्टि – जो कर्त्ता की रचना से कारण द्र्य किसी संयोगविशेष से अनेक प्रकार कार्यरूप होकर वर्तमान में व्यवहार करने योग्य होती है, वह ‘सृष्टि’ कहाती है।
जाति ३८. जाति – जो जन्म से लेकर मरणपर्यन्त बनी रहे, जो अनेक व्यक्तियों में एकरूप से प्राप्त हो, जो ईश्वरकृत अर्थात् मनुष्य, गाय, अश्व और वृक्षादि समूह हैं, वे ‘जाति’ शब्दार्थ से…
आर्य ४०. आर्य – जो श्रेष्ठस्वभाव, धर्मात्मा, परोपकारी, सत्यविद्यादि गुणयुक्त और आर्य्यावर्त्त देश में सब दिन से रहने वाले हैं, उनको ‘आर्य्य’ कहते हैं।
आर्य्यावर्त देश ४१. आर्य्यावर्त देश – हिमालय, विन्ध्याचल, सिन्धु नदी और ब्रह्मपुत्र नदी इन चारों के बीच और जहाँ तक इनका विस्तार है, उनके मध्य में जो देश है, उसका नाम ‘आर्य्यावर्त’ है।
दस्यु ४२. दस्यु – अनार्य अर्थात् जो अनाड़ी, आर्य्यों के स्वभाव और निवास से पृथक् डाकू चोर हिंसक जो कि दुष्ट मनुष्य है, वह ‘दस्यु’ कहाता है।
आश्रम ४५. आश्रम – जिनमें अत्यन्त परिश्रम करके उत्तम गुणों का ग्रहण और श्रेष्ठ काम किये जायें, उनको ‘आश्रम’ कहते हैं।
आश्रम के भेद ४६. आश्रम के भेद – जो सद्विद्यादि शुभ गुणों का ग्रहण, तथा जितेन्द्रियता से आत्मा और शरीर के बल को बढ़ाने के लिए ब्रह्मचारी, जो सन्तानोत्पत्ति और विद्यादि सब व्यवहारों को सिद्ध…
यज्ञ ४७. यज्ञ – जो अग्निहोत्र से ले के अश्वमेध पर्य्यन्त, वा जो शिल्प व्यवहार और पदार्थ विज्ञान जो कि जगत् के उपकार के लिए किया जाता है, उसको ‘यज्ञ’ कहते हैं।
कर्म ४८. कर्म – जो मन, इन्द्रिय और शरीर में जीव चेष्टा विशेष करता है, वह ‘कर्म’ कहाता है शुभ, अशुभ और मिश्रभेद से तीन प्रकार का है।