अनुमान ८७. अनुमान – किसी पूर्व दृष्ट पदार्थ के एक अङ्ग को प्रत्यक्ष देख के, पश्चात् उसके अदृष्ट अङ्गों का जिससे यथावत् ज्ञान होता है, उसको ‘अनुमान’ कहते हैं।
उपमान ८८. उपमान – जैसे किसी ने किसी से कहा कि गाय के तुल्य नील गाय होती ह, ऐसे जो उपमा से सदृश ज्ञान होता है, उसको ‘उपमान’ कहते हैं।
ऐतिह्य ९०. ऐतिह्य – जो शब्दप्रमाण के अनुकूल हो, जो कि असम्भव और झूठ लेख न हो उसी को ‘ऐतिह्य’ (इतिहास) कहते हैं।
अभाव ९३. अभाव – जैसे किसी ने किसी से कहा कि तू जल ले आ। उसने वहां देखा कि यहां जल नहीं है, परन्तु जहां जल है वहां से ले आना चाहिये। इस…
शास्त्र ९४. शास्त्र – जो सत्य विद्याओं के प्रतिपादन से युक्त हो और जिस करके मनुष्यों को सत्य सत्य शिक्षा हो, उसको ‘शास्त्र’ कहते हैं।
वेद ९५. वेद – जो ईश्वरोक्त, सत्य विद्याओं से युक्त ऋक्संहितादि चार पुस्तक हैं, जिनसे मनुष्यों को सत्यासत्य का ज्ञान होता है, उनको ‘वेद’ कहते हैं।
पुराण ९६. पुराण – जो प्राचीन ऐतरेय शतपथ ब्राह्मणादि ऋषि मुनि कृत सत्यार्थ पुस्तक हैं, उन्हीं को ‘पुराण, इतिहास, कल्प, गाथा और नाराशंसी’ कहते हैं।
उपवेद ९७. उपवेद – जो आयुर्वेद वैद्यकशास्त्र, जो धनुर्वेद शस्त्रशास्त्रविद्या राजधर्म्म, जो गान्धर्ववेद गानशास्त्र, और अर्थवेद जो शिल्पशास्त्र हैं, इन चारों को ‘उपवेद’ कहते हैं।
वेदांग ९८. वेदांग – जो शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष् आर्ष सनातन शास्त्र हैं, उनको ‘वेदांग’ कहते हैं।