चोरीत्याग ७५. चोरीत्याग – जो स्वामी की आज्ञा के विना किसी के पदार्थ को ग्रहण करना है, वह ‘चोरी’ और उसका छोड़ना ‘चोरीत्याग’ कहाता है।
व्यभिचारत्याग ७६. व्यभिचारत्याग – जो अपनी स्त्री के विना दूसरी स्त्री के साथ गमन करना, और अपनी स्त्री को भी ऋतुकाल के विना वीर्यदान करना, तथा अपनी स्त्री के साथ भी वीर्य का…
जीव का स्वरूप ७७. जीव का स्वरूप – जो चेतन, अल्पज्ञ, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान गुणवाला तथा नित्य है, वह ‘जीव’ कहाता है।
स्वभाव ७८. स्वभाव – जिस वस्तु का जो स्वाभाविक गुण है जैसे कि अग्नि में रूप और दाह, अर्थात् जब तक वह वस्तु रहे तब तक उसका वह गुण भी नहीं छूटता, इसलिये…
प्रलय ७९. प्रलय – जो कार्य जगत् का कारणरूप होना, अर्थात् जगत् का करनेवाला ईश्वर जिन जिन कारणों से सृष्टि बनाता है कि अनेक कार्य्यों को रचके यथावत् पालन करके पुनः कारणरूप करके…
मायावी ८०. मायावी – जो छल कपट स्वार्थ में ही प्रसन्नता दम्भ अहङ्कार शठतादि दोष हैं, और जो मनुष्य इनसे युक्त हो, वह ‘मायावी’ कहाता है।
आप्त ८१. आप्त – जो छलादि दोषरहित, धर्मात्मा, विद्वान् सत्योपदेष्टा, सब पर कृपादृष्टि से वर्त्तमान होकर अविद्यान्धकार का नाश करके अज्ञानी लोगों के आत्माओं में विद्यारूप सूर्य का प्रकाश सदा करे, उसको ‘आप्त’…
परीक्षा ८२. परीक्षा – जो प्रत्यक्षादि आठ प्रमाण, वेदविद्या, आत्मा की शुद्धि, और सृष्टिक्रम के अनुकूल विचार के सत्यासत्य को ठीक ठाक से निश्चय करना है, उसको ‘परीक्षा’ कहते हैं।
आठ प्रमाण ८३. आठ प्रमाण – प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव ये ‘आठ प्रमाण’ हैं। इन्हीं से सब सत्यासत्य का यथावत् निश्चय मनुष्य कर सकता है।
लक्षण ८४. लक्षण – जिससे जाना जाय, जो कि उसका स्वाभाविक गुण है, जैसे कि रूप से अग्नि को जाना जाता है, उसको ‘लक्षण’ कहते हैं।
प्रमेय ८५. प्रमेय – जो प्रमाणों से जाना जाता है, जैसे कि आँका का प्रमेय रूप अर्थ है, जो कि इन्द्रियों से प्रतीत होता है, उसको ‘प्रमेय’ कहते हैं।
प्रत्यक्ष ८६. प्रत्यक्ष – जो प्रसिद्ध शब्दादि पदार्थों के साथ श्रोत्रादि इन्द्रिय और मन के निकट सम्बन्ध से ज्ञान होता है, उसको ‘प्रत्यक्ष’ कहते हैं।