प्रारब्ध ५१. प्रारब्ध – जो पूर्व किये हुये कर्मों के सुख दुःख रूप फल का भोग किया जाता है, उसको ‘प्रारब्ध’ कहते हैं।
प्रवाह से अनादि पदार्थ ५३. प्रवाह से अनादि पदार्थ – जो कार्य्य जगत् जीव के कर्म, और जो इनका संयोग वियोग है, ये तीन ‘परम्परा से अनादि’ हैं।
अनादि का स्वरूप ५४. अनादि का स्वरूप – जो न कभी उत्पन्न हुआ हो, जिसका कारण कोई भी न होवे, अर्थात् जो सदा से स्वयंसिद्ध हो, वह ‘अनादि’ कहाता है।
पुरुषार्थ ५५. पुरुषार्थ – अर्थात् सर्वथा आलस्य छोड़ के उत्तम व्यवहारों की सिद्धि के लिये मन, शरीर, वाणी और धन से जो अत्यन्त उद्योग करना है, उसको ‘पुरुषार्थ’ कहते हैं।
परोपकार ५७. परोपकार – अर्थात् अपने सब सामर्थ्य से दूसरे प्राणियों के सुख होने के लिये जो तन, मन, धन से प्रयत्न करना है, वह ‘परोपकार’ कहाता है।
शिष्टाचार ५८. शिष्टाचार – जिसमें शुभ गुणों का ग्रहण और अशुभ गुणों का त्याग किया जाता है, वह ‘शिष्टाचार’ कहाता है।
सदाचार ५९. सदाचार – जो सृष्टि से लेके आज पर्यन्त सत्पुरुषों का वेदोक्त आचार चला आया है, कि जिसमें सत्या का ही आचरण और असत्य का परित्याग किया है, उसको ‘सदाचार’ कहते हैं।
विद्यापुस्तक ६०. विद्यापुस्तक – जो ईश्वरोक्त, सनातन, सत्य विद्यामय चार वेद हैं, उनको ‘विद्यापुस्तक’ कहते हैं।
आचार्य ६१. आचार्य – जो श्रेष्ठ आचार को ग्रहण करा के सब विद्याओं को पढ़ा देवे, उसको ‘आचार्य्य’ कहते हैं।