०२६ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (४) December 26, 2019 By Arun Aryaveer Download तृतीय समुल्लास भाग (४) अथ प्राणायाम विधि प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य। – योग० समाधिपादे सू० ३४। चौपाई प्रबल वेगि जस वमनहि वामे, निकसे अन्न थमत नहीं थामे। इह विधि श्वासहि बहिर निकासे, बहिर रोक भीतर मत स्वासे। खींचे ऊपर इन्द्रिय मूला, श्वास टिके समरथ अनुकूला। जब देखे अब मन घबरावे, बहिर श्वास रोका नहीं जावे। खैंचे अन्दर धीरे धीरे, तब लग मन में ओ३म् उचारे। दूर होय मन चंचलताई, पावे स्थिरता और निकाई। प्राणायामहु चार प्रकारा, सकल योग इसके आधारा। वाह्य विषय पहले को कहिये, बाहिर श्वास निरोधे रहिये। कहते दूसर को अभ्यन्तर, खँच बहिर से रोके अन्तर। थामे जहँ का तहँ इक बारा, स्तम्भन वृत्ति तृतीय प्रकारा। वाह्यभ्यन्तर क्षेपी नामा, जानहि चतुरथ प्राणायामा। अन्दर खेंचत बहिर धकेले, बहिर निकारत अन्दर रेले। क्रिया परस्पर श्वास विरोधी, इन्द्रिय मन चांचल्य निरोधी। बल वीरज पुरुषार्थ बढ़ाए, सूक्ष्म रूप प्रतिभा हो जाए। गहरे कठिन विषय सरलाये, व्याधि जरा निकट नहीं आये। नारिन के हित भी हित कारक, प्राणायाम कुदोष विदारक। ब्रह्म यज्ञ है सन्ध्योपासन, संध्या करे जमाए आसन। कर तल गत जल अँचहि आचमनी, शोधे कंठ हृदयगत धमनी। दोहा कीजे इतना आचमन, नीर हृदय तक जाय। कण्ठ शुद्धि तत्काल हो, कफ़ अरु पित्त नशाय।। चौपाई मार्जन करे उपासन कामा, मध्यम अँगुरी सहित अनामा। नयनादिक सों जलका परसन, आलस हरे करे चित परसन। जो जलका कहुं होय अभावा, मार्जन बिन नित नेम निभावा। प्राणायामहुं मंत्र समेता, बालहिं शिक्षा दे उपनेता। उपस्थान मनसा परिकर्मा, स्तवन उपासन सिखहि सुधर्मा। अघमर्षण पुन मंत्र सिखावे, पाप कर्म इच्छा नहीं आवे। निर्जन देशे सलिल किनारे, गायत्री जप मनहिं उचारे। वहीं करे संध्या नित नेमा, घ्यानावस्थित मग्न सप्रेमा। श्लोक अपां समीपे नियतो नैत्यकं विधिमास्थितः। सावित्रीमप्यधीर्यात गत्वारण्यं समाहितः।। – मनु० अ० २ । १०४ काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)