०२७ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (५) December 27, 2019 By Arun Aryaveer Download तृतीय समुल्लास भाग (५) दोहा देव यज्ञ नित हवन कर, ब्रह्म यज्ञ पश्चात। अग्नि होत्र सुख शान्तिमय, सन्ध्या और प्रभात।। प्रातर उदय होय जब भानु, हवन करे करि दीप्त कृशानु। साँझ समय रवि अस्त न होवे, अग्निहोत्र करि कल्मप धोवे। दोऊ सन्धि प्रातः अरु रजनी, संध्या हवन करे प्रभु भजनी। हो कर मग्न लगावे ध्याना, सायं प्रातः भजि भगवाना। माटी का इक कुण्ड रचावे, चाहे धातु का बनवावे। चतुष्कोण सुन्दर समरेखी, दर्शनीय दृढ़ होय बिसेखी। सोलह अंगुल मुख चौड़ाई, एती ही जानहु गहराई। तल में वेदि अंगुलि चारी, होम करे नित साँझ सवारी। ऊपर चौड़ा जेहि परमाने, चतुर्थांश तल वेदी जाने। अरणी आम्र पलाश सुचन्दन, वायु शुद्धि कर अरु मन रंजन। खंड खंड समिधा करवावे, जो वेदी मुख माँहि समावे। कुण्ड मध्य अग्नि कँह धरिये, ऊपर समिधा राख सँवरिये। प्रोक्षणि पात्र रु पात्र प्रणीता, आज्यस्थाली चमसा रीता। आज्यस्थाली मँह घृत डारे, प्रोक्षणी पात्रे नीर सुढारे। घृत को अग्नि चढ़ाए तपावे, जल हित प्रोक्षणी निकट रखावे। अधोलिखित मन्त्रण उच्चारे, घृत सामग्री आगिहिं डारे। श्लोक ओं भूरगन्ये प्राणाय स्वाहा। भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा। स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा। भूर्भवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्याणेभ्यः स्वाहा।। चौपाई मंत्र मंत्र प्रति डार आहूति, जल वायु की होवे पूती। जो जानहु आहूती थोरी, गायत्री पढ़ ड़ार बहोरी। अथवा पढ़ विश्वानि देवा, भूरि आहुति चहत जो देवा। श्लोक विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परां सुव। यदभ्द्रं तन्न आ र्सुव।। – यजु० ३०। ३ चौपाई ‘ओ३म्’ ‘भूः’ प्राणादिक जेते, सभी नाम ईश्वर के तेते। तात्पर्य स्वाहा का ऐसा, जैसा जाने बोले वैसा। जैसे प्रभु ने जगत रचाया, प्राणिमात्र पर करके दाया। रे नर तू भी हो उपकारी, अपने प्रभु के गुण अनुसारी। पर हित दे निज दान पदारथ, वाको जानिये भक्त यथारथ। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)