मरण १३. मरण – जिस शरीर को प्राप्त होकर जीव क्रिया करता है, उस शरीर और जीव का किसी काल में जो वियोग हो जाना है, उसको ‘मरण’ कहते हैं।
विद्या १६. विद्या – जिससे ईश्वर से लेके पृथिवीपर्य्यनत पदार्थों का सत्य विज्ञान होकर उनसे यथायोग्य उपकार लेना होता है, इसका नाम ‘विद्या’ है।
सत्पुरुष १८. सत्पुरुष – जो सत्यप्रिय धर्मात्मा विद्वान् सब के हितकारी और महाशय होते हैं, वे ‘सत्पुरुष’ कहाते हैं।
सत्सङ्ग कुसङ्ग १९. सत्सङ्ग कुसङ्ग – जिस करके झूठ से छूट के सत्य की ही प्राप्ति होती है, उसको ‘सत्सङ्ग’ और जिस करके पापों में जीव फँसे, उसको ‘कुसङ्ग’ कहते हैं।
तीर्थ २०. तीर्थ – जितने विद्याभ्यास, सुविचार, ईश्वरोपासना, धर्मानुष्ठान, सत्य का संग, ब्रह्मचर्य, जितेन्द्रयताद उत्तम कर्म हैं, वे सब ‘तीर्थ’ कहाते हैं। क्योंकि इन करके जीव दुःखसागर से तर जा सकते हैं।
स्तुति २१. स्तुति – जो ईश्वर वा किसी दूसरे पदार्थ के गुण ज्ञान, कथन, श्रवण और सत्यभाषण करना है, यह ‘स्तुति’ कहाती है।
स्तुति का फल २२. स्तुति का फल – जो गुणज्ञान आदि के करने से गुणवाले पदार्थों में प्रीति होती है, यह ‘स्तुति का फल’ कहाता है।
निन्दा २३. निन्दा – जो मिथ्याज्ञान मित्याभाषण झूठ में आग्रहादि क्रिया है, जिससे कि गुण छोड़कर उनके स्थान में अपगुण लगाना होता है, वह ‘निन्दा’ कहाती है।
प्रार्थना २४. प्रार्थना – अपने पूर्ण पुरुषार्थ के उपरान्त उत्तम कर्मों की सिद्धि के लिये परमेश्वर वा किसी सामर्थ्यवाले मनुष्य के सहाय लेने को ‘प्रार्थना’ कहते हैं।