038 Gayasphano Amivaha मूल स्तुति ग॒य॒स्फानो॑ अमीव॒हा व॑सु॒वित्पु॑ष्टि॒वर्ध॑नः। सु॒मि॒त्रः सो॑म नो भव॥३८॥ऋ॰ १।६।२१।२ व्याख्यान—हे परमात्मभक्त जीवो! अपना इष्ट जो परमेश्वर, सो “गयस्फानः” प्रजा, धन, जनपद और स्वराज्य का बढ़ानेवाला है, तथा “अमीवहा” शरीर,…
039 Tvam Hi Vishwatomukha मूल प्रार्थना त्वं हि वि॑श्वतोमुख वि॒श्वतः॑ परि॒भूरसि॑। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम्॥३९॥ऋ॰ १।७।५।६ व्याख्यान—हे अग्ने परमात्मन्! “त्वं, हि” तू ही “विश्वतः परिभूरसि” सब जगत् सब ठिकानों में व्याप्त हो, अतएव आप विश्वतोमुख…
040 Tameelata Prathamam मूल स्तुति तमी॑ळत प्रथ॒मं य॑ज्ञ॒साधं॒ विश॒ आरी॒राहु॑तमृञ्जसा॒नम्। ऊ॒र्जः पु॒त्रं भ॑र॒तं सृ॒प्रदा॑नुं दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम्॥४०॥ऋ॰ १।७।३।३ व्याख्यान—हे मनुष्यो! “तमीळत” उस अग्नि की स्तुति करो। कैसा है वह अग्नि? जो “प्रथमम्” सब…
041 Tamootayo Ranayan मूल प्रार्थना तमू॒तयो॑ रणय॒ञ्छूर॑सातौ॒ तं क्षेम॑स्य क्षि॒तयः॑ कृण्वत॒ त्राम्। स विश्व॑स्य व॒रुण॑स्येश॒ एको॑ म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥४१॥ऋ॰ १।७।९।२ व्याख्यान—हे मनुष्यो! “तमूतयः” उसी इन्द्र—परमात्मा की प्रार्थना तथा शरणागति से अपने को “ऊतयः”…
042 Sa Poorvaya Nivida मूल स्तुति स पूर्व॑या नि॒विदा॑ क॒व्यता॒योरि॒माः प्रजा अ॑जनय॒न्मनू॑नाम्। वि॒वस्व॑ता॒ चक्ष॑सा॒ द्याम॒पश्च॑ दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम्॥४२॥ऋ॰ १।७।३।२ व्याख्यान— हे मनुष्यो! सो ही “पूर्वया, निविदा” आदि, सनातन, सत्यता आदि गुणयुक्त अग्नि ही परमात्मा…
043 Vayam Jayema Twaya Yujaa मूल प्रार्थना व॒यं ज॑येम॒ त्वया॑ यु॒जा वृत॑म॒स्माक॒मंश॒मुद॑वा॒ भरे॑भरे। अ॒स्मभ्य॑मिन्द्र॒ वरि॑वः सु॒गं कृ॑धि॒ प्र शत्रू॑णां मघव॒न्वृष्ण्या॑ रुज॥४३॥ऋ॰ १।७।१४।४ व्याख्यान—हे इन्द्र—परमात्मन्! “त्वया युजा, वयं, जयेम” आपके साथ वर्त्तमान, आपके सहाय से हम…
044 Yo Vishwasya Jagatah मूल स्तुति यो विश्व॑स्य॒ जग॑तः प्राण॒तस्पति॒र्यो ब्र॒ह्मणे॑ प्रथ॒मो गा अवि॑न्दत्। इन्द्रो॒ यो दस्यूँ॒रध॑राँ अ॒वाति॑रन्म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥४४॥ऋ॰ १।७।१२।५ व्याख्यान—हे मनुष्यो! जो सब जगत् (स्थावर), जड़, अप्राणी का और “प्राणतः” चेतनावाले जगत्…
045 Mrilaa No Rudrota मूल प्रार्थना मृ॒ळा नो॑ रुद्रो॒त नो॒ मय॑स्कृधि क्ष॒यद्वी॑राय॒ नम॑सा विधेम ते। यच्छं च॒ योश्च॒ मनु॑राये॒जे पि॒ता तद॑श्याम॒ तव॑ रुद्र॒ प्रणी॑तिषु॥४५॥ऋ॰ १।८।५।२ व्याख्यान—हे दुष्टों को रुलानेहारे रुद्रेश्वर! “नः” हमको “मृळ” सुखी…
046 Devo Na Yah Prithiveem मूल स्तुति दे॒वो न यः पृ॑थि॒वीं वि॒श्वधा॑या उप॒क्षेति॑ हि॒तमि॑त्रो॒ न राजा॑। पु॒रः॒सदः॑ शर्म॒सदो॒ न वी॒रा अ॑नव॒द्या पति॑जुष्टेव॒ नारी॑॥४६॥ऋ॰ १।५।१९।३ व्याख्यान—हे प्रियबन्धु विद्वानो! “देवो न” ईश्वर सब जगत् के बाहर और…
047 Sa Maa Satyoktih प्रार्थनाविषय सा मा॑ स॒त्योक्तिः॒ परि॑ पातु वि॒श्वतो॒ द्यावा॑ च॒ यत्र॑ त॒तन॒न्नहा॑नि च। विश्व॑म॒न्यन्नि वि॑शते॒ यदेज॑ति वि॒श्वाहापो॑ वि॒श्वाहोदे॑ति॒ सूर्यः॑॥४७॥ऋ॰ ७।८।१२।२ व्याख्यान—हे सर्वाभिरक्षकेश्वर! “सा मा सत्योक्तिः” आपकी सत्य-आज्ञा, जिसका हमने अनुष्ठान किया…
048 Devo Devaanamasi मूल स्तुति दे॒वो दे॒वाना॑मसि मि॒त्रो अद्भु॑तो॒ वसु॒र्वसू॑नामसि॒ चारु॑रध्व॒रे। शर्म॑न्त्स्याम॒ तव॑ स॒प्रथ॑स्त॒मेऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥४८॥ऋ॰ १।६।३२।३ व्याख्यान—हे मनुष्यो! वह परमात्मा कैसा है कि हम लोग उसकी स्तुति करें। हे…
049 Ma No Vadheerindra प्रार्थनाविषय मा नो॑ वधीरिन्द्र॒ मा परा॑ दा॒ मा नः॑ प्रि॒या भोज॑नानि॒ प्र मो॑षीः। आ॒ण्डा मा नो॑ मघवञ्छक्र॒ निर्भे॒न् मा नः॒ पात्रा॑ भेत्स॒हजा॑नुषाणि॥४९॥ऋ॰ १।७।१९।३ व्याख्यान—हे “इन्द्र” परमैश्वर्ययुक्तेश्वर! “मा नो वधीः” हमारा…