026 Twamasi Prashasyo मूल स्तुति त्वम॑सि प्र॒शस्यो॑ वि॒दथे॑षु सहन्त्य। अग्ने॑ र॒थीर॑ध्व॒राणा॑म्॥२६॥ऋ॰ ५।८।३५।२ व्याख्यान—हे “अग्ने” सर्वज्ञ! तू ही सर्वत्र “प्रशस्यः” स्तुति करने के योग्य है, अन्य कोई नहीं। “विदथेषु” यज्ञ और युद्धों में आप…
027 Tan Na Indro Varuno मूल प्रार्थना तन्न॒ इन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निराप॒ ओष॑धीर्व॒निनो॑ जुषन्त। शर्म॑न्त्स्याम म॒रुता॑मु॒पस्थे॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥२७॥ऋ॰ ५।३।२७।५ व्याख्यान—हे भगवन्! “तन्न, इन्द्रः” सूर्य, “वरुणः” चन्द्रमा, “मित्रः” वायु, “अग्निः” अग्नि, “आपः” जल,…
028 Rishirhi Poorvaja Asyeka मूल स्तुति ऋषि॒र्हि पू॑र्व॒जा अस्येक॒ ईशा॑न॒ ओज॑सा। इन्द्र॑ चोष्कू॒यसे॒ वसु॑॥२८॥ऋ॰ ५।८।१७।१ व्याख्यान—हे ईश्वर! “ऋषिः” सर्वज्ञ “पूर्वजाः” और सबके पूर्वजनक “ एकः” एक, अद्वितीय “ईशानः” ईशन-कर्त्ता, (अर्थात् ईश्वरता करनेहारे) तथा सबसे…
029 Neha Bhadram Rakshasvine मूल प्रार्थना नेह भ॒द्रं र॑क्ष॒स्विने॒ नाव॒यै नोप॒या उ॒त। गवे॑ च भ॒द्रं धे॒नवे॑ वी॒राय॑ च श्रवस्य॒ते॑ऽने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु ऊ॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥२९॥ऋ॰ ६।४।९।२ व्याख्यान—हे भगवन्! “रक्षस्विने भद्रं, नेह” पापी, हिंसक, दुष्टात्मा…
030 Vasurvasupatirhi मूल स्तुति वसु॒र्वसु॑पति॒र्हि क॒मस्य॑ग्ने वि॒भाव॑सुः। स्याम॑ ते सुम॒तावपि॑॥३०॥ऋ॰ ६।३।४०।४ व्याख्यान—हे परमात्मन्! आप “वसुः” सबको अपने में बसानेवाले और सबमें आप बसनेवाले हो तथा “वसुपतिः” पृथिव्यादि वासहेतुभूतों के पति हो। “कमसि”…
031 Vaishwanarasya Sumatau मूल प्रार्थना वै॒श्वा॒न॒रस्य॑ सुम॒तौ स्या॑म॒ राजा॒ हि कं॒ भुव॑नानामभि॒श्रीः। इ॒तो जा॒तो विश्व॑मि॒दं वि च॑ष्टे वैश्वान॒रो य॑तते॒ सूर्ये॑ण॥३१॥ऋ॰ १।७।६।१ व्याख्यान—हे मनुष्यो! जो हमारा तथा सब जगत् का राजा सब भुवनों का…
032 Na Yashya Deva Devata मूल स्तुति न यस्य॑ दे॒वा दे॒वता॒ न मर्ता॒ आप॑श्च॒न शव॑सो॒ अन्त॑मा॒पुः। स प्र॒रिक्वा॒ त्वक्ष॑सा॒ क्ष्मो दि॒वश्च॑ म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥३२॥ऋ॰ १।७।१०।५ व्याख्यान—हे अनन्तबल! “न यस्य” जिस परमात्मा का और उसके बलादि…
033 Jaatvedase Sunavaama मूल प्रार्थना जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑मरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेदः॑। स नः॑ पर्ष॒दति॑ दु॒र्गाणि॒ विश्वा॒ ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तात्य॒ग्निः॥३३॥ऋ॰ १।७।७।१ व्याख्यान—हे “जातवेदः” परब्रह्मन्! आप जातवेद हो, उत्पन्नमात्र सब जगत् को जाननेवाले हो, सर्वत्र…
034 Sa Vajrabrit Dasyuha मूल स्तुति स व॑ज्र॒भृद्द॑स्यु॒हा भी॒म उ॒ग्रः स॒हस्त्र॑चेताः श॒तनी॑थ॒ ऋभ्वा॑। च॒म्री॒षो न शव॑सा॒ पाञ्च॑जन्यो म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥३४॥ऋ॰ १।७।१०।२ व्याख्यान—हे दुष्टनाशक परमात्मन्! आप “वज्रभृत्” अच्छेद्य (दुष्टों के छेदक) सामर्थ्य से सर्वशिष्ट हितकारक,…
035 Semum Nah Kaamamaaprina मूल प्रार्थना सेमं नः॒ काम॒मा पृ॑ण॒ गोभि॒रश्वैः॑ शतक्रतो। स्तवा॑म त्वा स्वा॒ध्यः॑॥३५॥ऋ॰ १।१।३१।४ व्याख्यान—हे “शतक्रतो” अनन्तक्रियेश्वर! आप असंख्यात विज्ञानादि यज्ञों से प्राप्य हो तथा अनन्तक्रियाबलयुक्त हो, सो आप “गोभिरश्वैः” गाय, उत्तम…
036 Soma Geerbhistvaa मूल स्तुति सोम॑ गी॒र्भिष्ट्वा॑ व॒यं व॒र्धया॑मो वचो॒विदः॑। सु॒मृ॒ळी॒को न॒ आ वि॑श॥३६॥ऋ॰ १।६।२१।१ व्याख्यान—हे “सोम” सर्वजगदुत्पादकेश्वर! आपको “वचोविदः” शास्त्रवित् हम लोग स्तुतिसमूह से “वर्धयामः” सर्वोपरि विराजमान मानते हैं। “सुमृळीकः, नः आविश”,…
037 Soma Rarandhi No Hridee मूल प्रार्थना सोम॑ रार॒न्धि नो॑ हृ॒दि गावो॒ न यव॑से॒ष्वा। मर्य॑इव॒ स्व ओ॒क्ये॑॥३७॥ऋ॰ १।६।२१।३ व्याख्यान—हे “सोम” सोम्य! सौख्यप्रदेश्वर! आप कृपा करके “रारन्धि, नो हृदि” हमारे हृदय में यथावत् रमण करो। (दृष्टान्त)—जैसे…