013 Twamasya Paare मूल स्तुति त्वम॒स्य पा॒रे रज॑सो॒ व्यो॑मनः॒ स्वभू॑त्योजा॒ अव॑से धृषन्मनः। च॒कृ॒षे भूमिं॑ प्रति॒मान॒मोज॑सो॒ऽपः स्वः॑ परि॒भूरे॒ष्या दिव॑म्॥१३॥ऋ॰ १।४।१४।२ व्याख्यान—हे परमैश्वर्यवन् परमात्मन्! आकाशलोक के पार में तथा भीतर अपने ऐश्वर्य और बल से…
014 Vijaaneehyaaryan Ye Cha मूल प्रार्थना वि जा॑नी॒ह्यार्या॒न् ये च॒ दस्य॑वो ब॒र्हिष्म॑ते रन्धया॒ शास॑दव्र॒तान्। शाकी॑ भव॒ यज॑मानस्य चोदि॒ता विश्वेत्ता ते॑ सध॒मादे॑षु चाकन॥१४॥ऋ॰ १।४।१०।३ व्याख्यान—हे यथायोग्य सबको जाननेवाले ईश्वर! आप “आर्यान्” विद्या, धर्मादि उत्कृष्ट स्वभावाचरणयुक्त…
015 Na Yasya Dyava Prithivee मूल स्तुति न यस्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी अनु॒ व्यचो॒ न सिन्ध॑वो॒ रज॑सो॒ अन्त॑मान॒शुः। नोत स्ववृ॑ष्टिं॒ मदे॑ अस्य॒ युध्य॑त॒ एको॑ अ॒न्यच्च॑कृषे॒ विश्व॑मानु॒षक्॥१५॥ऋ॰ १।४।१४।४ व्याख्यान—हे परमैश्वर्ययुक्तेश्वर! आप इन्द्र हो। हे मनुष्यो! ‘जिस परमात्मा का…
016 Urdhwo Na Pahyanhaso मूल प्रार्थना ऊ॒र्ध्वो नः॑ पा॒ह्यंह॑सो॒ नि के॒तुना॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह। कृ॒धी न॑ ऊ॒र्ध्वां च॒रथा॑य जी॒वसे॑ वि॒दा दे॒वेषु॑ नो॒ दुवः॑॥१६॥ऋ॰ १।३।१०।४॥ व्याख्यान—हे सर्वोपरि विराजमान परब्रह्म आप “ऊर्ध्वः” सबसे उत्कृष्ट हो, हमको…
017 Aditir Diaorantariksha मूल स्तुति अदि॑ति॒र्द्यौरदि॑तिर॒न्तरि॑क्ष॒मदि॑तिर्मा॒ता स पि॒ता स पु॒त्रः। विश्वे॑ दे॒वा अदि॑तिः॒ पञ्च॒ जना॒ अदि॑तिर्जा॒तमदि॑ति॒र्जनि॑त्वम्॥१७॥ऋ॰ १।६।१६।१० व्याख्यान—हे त्रैकाल्याबाध्येश्वर! “अदितिर्द्यौः” आप सदैव विनाशरहित तथा स्वप्रकाशरूप हो। “अदितिरन्तरिक्षम्” अविकृत (विकार को न प्राप्त) और…
018 Rijuneeti No Varuno ऋ॒जु॒नी॒ती नो॒ वरु॑णो मि॒त्रो न॑यतु वि॒द्वान्। अ॒र्य॒मा दे॒वैः स॒जोषाः॑॥१८॥ऋ॰ १।६।१७।१ व्याख्यान—हे महाराजाधिराज परमेश्वर! आप हमको “ऋजुनीती” सरल (शुद्ध) कोमलत्वादिगुणविशिष्ट चक्रवर्ती राजाओं की नीति को “नयतु” कृपादृष्टि से प्राप्त करो। आप…
019 Twam Somaasi मूल स्तुति त्वं सो॑मासि॒ सत्प॑ति॒स्त्वं राजो॒त वृ॑त्र॒हा। त्वं भ॒द्रो अ॑सि॒ क्रतुः॑॥१९॥ऋ॰ १।६।१९।५ व्याख्यान—हे “सोम” राजन्! सत्पते! परमेश्वर! तुम ‘सोम, सर्वसवनकर्त्ता (सबका सार निकालनेहारे), प्राप्यस्वरूप, शान्तात्मा हो तथा सत्पुरुषों का प्रतिपालन…
020 Twam Nah Som Vishvato मूल प्रार्थना त्वं नः॑ सोम वि॒श्वतो॒ रक्षा॑ राजन्नघाय॒तः। न रि॑ष्ये॒त् त्वाव॑तः॒ सखा॑॥२०॥ऋ॰ १।६।२०।३ व्याख्यान—हे सोम! राजन्नीश्वर! तुम “अघायतः” जो कोई प्राणी हममें पापी और पाप करने की इच्छा करनेवाले हों…
021 Tad Vishnoh Paramam Padam मूल स्तुति तद्विष्णोः॑ पर॒मं प॒दं सदा॑ पश्यन्ति सू॒रयः॑। दि॒वी॑व॒ चक्षु॒रात॑तम्॥२१॥ऋ॰ १।२।७।२० व्याख्यान—हे विद्वान् और मुमुक्षु जीवो! विष्णु का जो परम अत्यन्तोत्कृष्ट पद (पदनीय) सबके जानने योग्य, जिसको प्राप्त होके पूर्णानन्द…
022 Sthira Vah Santvayudha मूल प्रार्थना स्थि॒रा वः॑ स॒न्त्वायु॑धा परा॒णुदे॑ वी॒ळू उ॒त प्र॑ति॒ष्कभे॑। यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ पनी॑यसी॒ मा मर्त्य॑स्य मा॒यिनः॑॥२२॥ऋ॰ १।३।१८।२ व्याख्यान—(परमेश्वरो हि सर्वजीवेभ्य आशीर्ददाति) ईश्वर सब जीवों को आशीर्वाद देता है कि, हे जीवो!…
023 Vishnoh Karmaani Pashyat मूल स्तुति विष्णोः॒ कर्मा॑णि पश्यत॒ य॑तो व्र॒तानि॑ पस्प॒शे। इन्द्र॑स्य॒ युज्यः॒ सखा॑॥२३॥ऋ॰ १।२।७।४ व्याख्यान—हे जीवो! “विष्णोः” व्यापकेश्वर के किये दिव्य जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदि कर्मों को तुम देखो। (प्रश्न)—किस…
024 Paranudasva Maghavan मूल प्रार्थना परा॑ णुदस्व मघवन्न॒मित्रान्त्सु॒वेदा॑ नो॒ वसू॑ कृधि। अ॒स्माकं॑ बोध्यवि॒ता म॑हाध॒ने भवा॑ वृ॒धः सखी॑नाम्॥२४॥ऋ॰ ५।३।२१।५ व्याख्यान—हे “मघवन्” परमैश्वर्यवन्! इन्द्र! परमात्मन्! “अमित्रान्” हमारे सब शत्रुओं को “पराणुदस्व” परास्त कर दो। हे…