075 Brahma Jajyanam Prathamam मूल स्तुति ब्रह्म॑ जज्ञा॒नं प्र॑थ॒मं पु॒रस्ता॒द्वि सी॑म॒तः सु॒रुचो॑ वे॒नऽआ॑वः। स बु॒ध्न्याऽउप॒माऽअ॑स्य वि॒ष्ठाः स॒तश्च॒ योनि॒मस॑तश्च॒ वि वः॑॥२८॥ यजु॰ १३।३ व्याख्यान—हे महीय परमेश्वर! आप बड़ों से भी बड़े हो, आपसे बड़ा वा…
076 Sumitriya Na Aapa मूल प्रार्थना सु॒मि॒त्रि॒या न॒ऽआप॒ऽओष॑धयः सन्तु दुर्मित्रि॒यास्तस्मै॑ सन्तु॒ योऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः॥२९॥यजु॰ ३६।२३॥ व्याख्यान—हे सर्वमित्रसम्पादक! आपकी कृपा से प्राण और जल तथा विद्या और ओषधि “सुमित्रियाः” सुखदायक हम लोगों…
077 Ya Imam Vishwa मूल स्तुति य ऽ इ॒मा विश्वा॒ भुव॑नानि॒ जुह्व॒द् ऋषि॒र्होता॒ न्यसी॑दत् पि॒ता नः॑। स ऽ आ॒शिषा॒ द्र॒वि॑णमि॒च्छमा॑नः प्रथम॒च्छदव॑राँ॒२॥ऽआ वि॑वेश॥३०॥ व्याख्यान—“होता” उत्पत्ति समय में देने और प्रलय समय में सबको लेनेवाला परमात्मा…
078 Ishe Pinvaswa मूल प्रार्थना इ॒षे पि॑न्वस्वो॒र्जे पि॑न्वस्व॒ ब्रह्म॑णे पिन्वस्व क्ष॒त्राय॑ पिन्वस्व॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्यां॑ पिन्वस्व॒। धर्मा॑सि सुधर्मामे॑न्य॒स्मे नृ॒म्णानि॑ धारय॒ ब्रह्म॑ धारय क्ष॒त्रं धा॑रय॒ विशं॑ धारय॥३१॥ यजु॰ ३८।१४ व्याख्यान—हे सर्वसौख्यप्रदेश्वर! हमको “इषे” उत्तमान्न के लिए…
079 Kimswidaasidadhisthanam मूल स्तुति कि स्वि॑दासीदधि॒ष्ठान॑मा॒रम्भ॑णं कत॒मत्स्वि॑त्क॒थासी॑त्। यतो॒ भूमिं॑ ज॒नय॑न्वि॒श्वक॑र्मा॒ वि द्या॒मौ॑र्णो॑न्महि॒ना वि॒श्वच॑क्षाः॥३२॥ यजु॰ १७।१८ व्याख्यान—(प्रश्नोत्तरविद्या से—) इस संसार का अधिष्ठान क्या है? कारण तथा उत्पादक कौन है? किस प्रकार से है…
080 Tanoopaagnesi मूल प्रार्थना त॒नू॒पाऽ अ॑ग्नेऽसि त॒न्वं मे पाह्यायु॒र्दाऽ अ॑ग्ने॒ऽस्यायु॑र्मे देहि। व॒चो॒र्दाऽ अ॑ग्नेऽसि॒ वर्चो॑ मे देहि। अग्ने॒ यन्मे त॒न्वाऽ ऊ॒नं तन्म॒ऽआपृ॑ण॥३३॥ यजु॰ ३।१७ व्याख्यान—हे सर्वरक्षकेश्वराग्ने! तू हमारे शरीर का रक्षक है। सो…
081 Wishvatashchakshuruta मूल स्तुति वि॒श्वत॑श्चक्षुरु॒त वि॒श्वतो॑मुखो वि॒श्वतो॑बाहुरु॒त वि॒श्वत॑स्पात्। सं बा॒हुभ्यां॒ धम॑ति॒ सं पत॑त्रै॒र्द्यावा॒भूमी॑ ज॒नय॑न् दे॒व एकः॑॥३४॥ यजु॰ १७।१९ व्याख्यान—विश्व (सब जगत् में) जिसका चक्षु (दृष्टि) है, जिससे अदृष्ट कोई वस्तु नहीं है…
082 Suprajah Prajabhih मूल प्रार्थना भूर्भुवः॒ स्वः सुप्र॒जाः प्र॒जाभिः॑ स्यासु॒वीरो॑ वी॒रैः सु॒पोषः॒ पोषैः। नर्य॑ प्र॒जां मे॑ पाहि शस्य॑ प॒शून् मे॑ पा॒ह्यथ॑र्य पि॒तुं मे॑ पाहि॥३५॥ यजु॰ ३।३७ व्याख्यान—हे सर्वमङ्गलकारकेश्वर! आप “भूः” सदा वर्त्तमान हो…
083 Kimswidwanam मूल स्तुति कि स्वि॒द्वनं॒ क उ॒ स वृ॒क्ष आ॑स॒ यतो॒ द्यावा॑पृथि॒वी नि॑ष्टत॒क्षुः। मनी॑षिणो॒ मन॑सा पृ॒च्छतेदु॒ तद्यद॒ध्यति॑ष्ठ॒द् भुव॑नानि धा॒रय॑न्॥३६॥ यजु॰ १७।२० व्याख्यान—(प्रश्न) विद्या क्या है? वन और वृक्ष किसको कहते हैं?…
084 Tatchakshur Devhitam मूल प्रार्थना तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत्। पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तं जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तꣳ शृणु॑याम श॒रदः॑ श॒तं प्रब्र॑वाम श॒रदः॑ श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रदः॑ श॒तं भूय॑श्च श॒रदः॑ श॒तात्॥३७॥ यजु॰ ३६।२४ व्याख्यान—वह ब्रह्म, “चक्षुः” सर्वदृक् चेतन है…
085 Yaa Te Dhamaani मूल स्तुति या ते॒ धामा॑नि पर॒माणि॒ याव॒मा या म॑ध्य॒मा वि॒श्वकर्मन्नु॒तेमा। शिक्षा॒ सखि॑भ्यो ह॒विषि॑ स्वधावः स्व॒यं य॑जस्व त॒न्वं वृधा॒नः॥३८॥ यजु॰ १७।२१ व्याख्यान—हे सर्वविधायक विश्वकर्मन्नीश्वर! जो तुम्हारे स्वरचित उत्तम, मध्यम, निकृष्ट त्रिविध…
086 Yanme Chidram Chakshusho मूल प्रार्थना यन्मे॑ छि॒द्रं चक्षु॑षो॒ हृद॑यस्य॒ मन॑सो॒ वाति॑ तृण्णं॒ बृह॒स्पति॑र्मे॒ तद्द॑धातु। शं नो॑ भवतु॒ भुव॑नस्य॒ यस्पतिः॑॥३९॥यजु॰ ३६।२ व्याख्यान—हे सर्वसन्धायकेश्वर! मेरे चक्षु (नेत्र), हृदय (प्राणात्मा), मन, बुद्धि, विज्ञान, विद्या और सब…