समाधि की स्थिति की कुछ अनुभूतियां August 14, 2019 By Arun Aryaveer समाधि की स्थिति की कुछ अनुभूतियां जब समाधि प्राप्त होती है तब हमारे शरीर पर कुछ प्रभाव होते हैं। उन प्रभावों में से एक प्रभाव यह है कि साधक के मस्तक के मध्य के भाग में एक विशेष दबाव अनुभव में आता है, मानो कि कोई वस्तु मस्तक में चिपका दी गई हो।दूसरा प्रभाव यह अनुभव में आता है कि समाधि अवस्था में शीत व उष्णता को सहने का विशेष सामर्थ्य उत्पन्न हो जाता है। उदाहरण के लिए साधक को समाधि की स्थिति से पूर्व यदि शीत से शरीर की रक्षा के लिए एक कुर्ता व कम्बल धारण करने पड़े थे। उसी साधक को समाधि की स्थिति में अब इन शरीर रक्षक वस्त्रों के न धारण करने पर भी शीत बाधित नहीं करता। परन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि साधक को बर्फ से ढकने पर भी उसे शीत बाधित नहीं करेगा। एक सीमा तक ही सहनशक्ति में वृद्धि माननी चाहिए।इसी प्रकार से रुग्ण अवस्था में भी एक सीमा तक साधक को रोग बाधित नहीं करता।समाधि के प्राप्त होने पर साधक को यह मानसिक अनुभूति होती है कि मैं समस्त दुःखों, क्लेशों व बन्धनों से छूट गया हूं और संसार के अन्य समस्त प्राणि बन्धनों, क्लेशों से ग्रस्त हैं।बौद्धिक स्तर पर वह आकाशवत अवस्था का अनुभव करता है अर्थात् उसे संसार की प्रलयवत अवस्था दिखाई देती है। उस स्थिति में वह मृत्यु आदि समस्त भयों से मुक्त हो जाता है।इस अवस्था में संसार के समस्त पदार्थों का स्वामी ईश्वर को ही मानता है और अपने तथा समस्त प्राणियों के बने हुए स्व-स्वामी सम्बन्ध को समाप्त कर देता है। यह अवस्था उसे इतनी प्रिय और सुखप्रद लगती है कि संसार के समस्त सुखों को वह दुःखरूप देखता है। इस स्थिति व सुख को छोड़ना नहीं चाहता। इस स्थिति को छोड़कर के वह रात्रि में सोना नहीं चाहता, परन्तु स्वास्थ्य रक्षा हेतु उसे रात्रि में सोना ही पड़ता है।ईश्वरप्रणिधान से युक्त इस बौद्धिक स्तर पर सम्पादित की गई प्रलयावस्था में सम्प्रज्ञात समाधि का प्रारम्भ हो जाता है। इस अवस्था में साधक को देहादि से पृथक् अपने स्वरूप की अनुभूति होनी प्रारम्भ हो जाती है। सम्प्रज्ञात समाधि का जैसे-जैसे उत्कर्ष होता चला जाता है वेसे-वैसे शरीर, इन्द्रियों, मनादि उपकरणों से पृथक्, अपने स्वरूप की अनुभूति होनी प्रारम्भ हो जाती है। धीरे-धीरे अपने आत्मस्वरूप की अनुभूति में भी स्पष्टता बढ़ती चली जाती है।। अर्थात् साधक का अपने स्वरूप विषयक ज्ञान प्रवृद्धि को प्राप्त होता चला जाता है। साधक सम्प्रज्ञात समाधि की अन्तिम उत्कर्षता को प्राप्त करके भी पूर्णरूपेण सन्तुष्ट नहीं हो पाता है। क्योंकि अभी उसकी ईश्वर साक्षात्कार की अभिलाषा पूर्ण नहीं हो पाई है।ईश्वरसाक्षात्कार के लिए वह परमात्मा, ओम् आदि शब्दों को लेकर बार-बार ईश्वर के नाम को जपता हुआ ईश्वर-प्रणिधान की ऊँची स्थिति को बना लेता है। जिस प्रकार एक छोटा बालक अपनी माता के भीड़ में खो जाने पर उसकी प्राप्ति के लिए अत्यन्त लालायित होता है, उस समय उस बालक को अपने माता के अतिरिक्त कुछ भी अच्छा नहीं लगता। वह बार-बार माताजी… माताजी… ऐसा बोलता है, उसी प्रकार साधक ईश्वरसाक्षात्कार के लिए बार-बार हे परमात्मा… परमात्मा… ऐसा बोलता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर उसको सुपात्र मानकर अपनी शरण में ले लेता है और उसको अपना विशिष्ट ज्ञान देकर अपने स्वरूप का साक्षात्कार करवा देता है। इस अवस्था में साधक को विशिष्ट नित्य आनन्द तथा विशिष्ट ज्ञान की अनुभूति होती है। इस अवस्था में सर्वव्यापक ईश्वर का साक्षात्कार ऐसे ही होता है जैसे कि लोहे के गोले में अग्नि सर्वव्यापक दिखाई देती है।साधक सब जीवों तथा लोक-लोकान्तरों को ईश्वर में व्याप्य तथा ईश्वर को इनमें व्यापक प्रत्यक्ष रूप में अनुभव करता है कि मैंने जो पाना था सो पा लिया और जो जानना था वह जान लिया। अब इसके अतिरिक्त कुछ और पाने योग्य और जानने योग्य शेष नहीं रहा। Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. Required fields are marked *Comment * Name * Email * Website Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment.