वैदिक सोलह संस्कार August 19, 2019 By Arun Aryaveer वैदिक सोलह संस्कार भूषणभूत सम्यकीकरण को संस्कार कहते हैं। देवत्वीकरण तथा समाजीकरण के श्रेष्ठ सांचों में मानव को ढाल कर सुसंस्कृत कर देने का नाम भूषणभूत सम्यक् कृति है। अथवा जिससे शरीर मन बुद्धि आत्मा सुसंस्कृत होने से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्राप्त हो सकते हैं तथा जिससे सन्तान योग्य होते हैं उसे संस्कार कहते हैं। संस्कार के दोषमार्जन, हीनांगपूर्ती तथा अतिशयाधान ये तीन चरण हैं। गर्भाधान से मृत्यु पर्यन्त जीवन सन्धियों उम्र सन्धियों ऋतु सन्धियों पर सोलह संस्कारों का प्रावधान है। 1. गर्भाधान, 2. पुंसवन, 3. सीमन्तोन्नयन, 4. जातकर्म, 5. नामकरण, 6. निष्क्रमण, 7. अन्नप्राशन, 8. चूड़ाकर्म, 9. कर्णवेध, 10. उपनयन, 11. वेदारम्भ, 12. समावर्तन, 13. विवाह, 14. वानप्रस्थ, 15. संन्यास एवं 16. अन्त्येष्टि ये सोलह संस्कार हैं। इनमें तीन गर्भावस्था सम्बन्धित, नौं ब्रह्मचर्यावस्था सम्बन्धित, क्रमशः एकेक गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास सम्बन्धित तथा अन्तिम संस्कार मरणोपरान्त शरीर पर किया जाता है। भूषणभूत सम्यकीकरण को संस्कार कहते हैं। अर्थात् जिस क्रिया से शरीर, मन और आत्मा उत्तम हो उसे संस्कार कहते हैं। वैदिक सोलह संस्कार मानव जीवन निर्माण योजना है। संस्कार बीज से कर्मवृक्ष का विस्तार होता है। संस्कार संस्कृति को जन्म देते हैं। संस्कृति का अर्थ है शोभामय सम्यक् कृति। मनुष्य के व्यक्तिगत तथा सामाजिक सर्वाभ्युदय के अनुकूल आचार-विचार ही संस्कारमय वर्णाश्रम प्रणाली का उद्देश्य है। संस्कार रूपी क्रिया से मनुष्य का शरीर और आत्मा सुसंकृत होने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त हो सकता है। शरीर और आत्मा सुसंस्कृति भावना संस्कार प्रारम्भ में ही है, जब संस्कारी और संस्कारकर्ता ब्रह्म हमारा बिछौना ओढ़ना हो कहकर सत्य, यश, श्री, समृद्धिपूर्ण जीवन की कामना करता है। अस्तित्व पहचान संकट प्कमदजपलि बतपेपे विश्वव्यापी संकट है। व्यक्ति का देश, काल, परिस्थिति, सम्बन्ध, स्तर का ध्यान न रखना अस्तित्व पहचान संकट है। वैदिक व्यक्तित्व संकल्पना अस्तित्व पहचान प्रदाता है। इसमें मानव के व्यक्तिगत, सांस्कृतिक, सामाजिक विकास की धारणा एक साथ उसके अस्तित्व में पिरोयी गई है। मानव शरीर को सुखम् रथम् कहा गया है जिसमें आठ चक्र, नौ द्वार, एक सर्वद्वार, दो अव्यक्त द्वार हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, ललना, आज्ञा तथा सहस्रार ये अष्ट चक्र; पायु (मलद्वार), उपायु (मूत्रद्वार), मुख, दो आंखें, दो नासिकापुट और दो कर्णरन्ध्र ये नौ द्वार; त्वचा-सर्वद्वार, नाभिरन्ध्र तथा ब्रह्मरन्ध्र ये दो अव्यक्त द्वार मिलाकर अयोध्यापुरी कहाती है। इसमें एक ज्योतित आवास कोष है। जिसमें पुरी अधिष्ठाता रहता है। यह एक चलता-फिरता रथ है जिसमें कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियों के घोडे, मन की लगाम सधे, बुद्धि सारथी नियन्त्रित और आत्म रथी रथ नियन्त्रित करता सवार है। यह सुखं रथम् है। यह एक अस्तित्व पहचान है, जो व्यक्ति को सशक्त करता है। वर्तमान मानव का विकास तो पर्याप्त हुआ है। वह विकास सर्वांगणीय नहीं है। भौतिक विकास की दर ने आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक विकास को काफी पीछे छोड़ दिया है। विज्ञान की एक लय प्रगति सतत जारी है पर ज्ञान का विकास रुक गया है। ज्ञान विज्ञान से सूक्ष्म है। मानव अस्तित्व में सप्त ऋषि वाक्, प्राण, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, तथा इससे सम्बन्धित व्यवस्था तानना तथा इसका विकास कर मानव सशक्त करना आधिदैविक ज्ञान है। भौतिक संसाधनों को जानना पहचानना तथा उनका सुख हेतु प्रयोग करना विज्ञान है। इस विज्ञान का मानवीय सम्बन्धों के विकास क्षेत्र में उपयोग करना आधिभौतिक ज्ञान है। आधिदैविक पार क्षेत्र मानव तप द्वारा ऋद्धि, सिद्धि, तितिक्षा द्वारा ऋत, शृत, धृत, भृग, ऋण सिद्ध कर मुमुक्षुत्व आत्म क्षेत्र कारण संकल्प शरीरों को मुमुक्षुत्व सिद्धि पा ब्रह्मलय अपने कार्यों में उतारता है। भारतीय संस्कृति को यह मानव अस्तित्व पहचान अभीष्ट है। Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. Required fields are marked *Comment * Name * Email * Website Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment.