धर्मयुक्त नेक रहें

“संगच्छध्वं-सम्वदध्वम्” धर्मयुक्त नेक रहें, मन्त्र एक। निज विरोध तजें, सम अन्तःकरण हों।। टेक।। हविष्य समान हो, हृदय तुल्य हो। मानस समान हो, उदार हो। ममता साकार हो, ममता साकार हो।।…

ब्रह्म युजित उन्मुक्त तू हो जा

“प्रतिजन” (तर्ज :- दर्शन दो घनश्याम) ब्रह्म युजित उन्मुक्त तू हो जा धरती वासी रे।। टेक।। देश देश ना सीमा तेरी, ब्रह्माण्ड रागमय वीणा तेरी। फैल बिखर जा अन्तस्वासी, दिव्य…

प्रेय ससीम तू जी श्रेय असीम तू जी

“श्रेय-प्रेय” प्रेय ससीम तू जी, श्रेय असीम तू जी। रोटी कपड़ा मकान, प्रेय बस तीन तू जी।। टेक।। सूक्ष्मतम से महानतम। ब्रह्म झीन-झीन जी।। 1।। सौ हाथों इकट्ठा कर। हजारों…

अल्पकालीन जीवन ब्रह्म पूरा भरा है

“हमारी ही भूल” अल्पकालीन जीवन, ब्रह्म पूरा भरा है। हम ही ना पहचानें…(2) हमारी ही भूल।। टेक।। जीया ना परहित हरपल हमनें। रहें मगन हम खुद में।। स्वहित त्यागें जो…

जिसने सच जीवन में उतारा

“ब्रह्मित” जिसने सच जीवन में उतारा जितना। उसने सुख पाया उतना।।टेक।। ज्ञान ही ज्ञान है उस जीवन में, वेद है जिसमें भरा। सद्गुण चाहा सद्गुण सराहा, सद्गुण कर्म में उतारा।…

ईशावास्यमिदं सर्वम्

“आत्म ब्रह्म में” ओ3म् नारायणः, ओ3म् खं ब्रह्म। ईशावास्यमिदं सर्वम्… (2)।। टेक।। सृष्टि यज्ञ सुरचना, संधि संधि अर्चना। समीपतम है हितकर, ब्रह्म ज्योतित है घर।। अग्निम् ईळे पुरोहितम्, यज्ञस्य देव…

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