२/४ मानवता August 6, 2019 By Arun Aryaveer घेरों को घेर दो उन्मुक्त हो ही जाओगे मानवता त्सू कुंग पुछता है “एक शब्द में बताइए मन्युष्य का कर्तव्य क्या है?” कांगफ्यूत्सी करता है “भाई-चारा प्रेम।” ‘मत करो दूसरों के साथ वैसा व्यवहार जैसा कि तुम नहीं चाहते कि वे तुम्हारे साथ करें।’ इतने बडे धर्म का सन्देश छोटा सा भोला बालक भी सहजतः देता है। उसे हल्का सा चपत लगाने पर वह हल्का सा आप को चपत लगा देता है। उसका गाल प्यार से चूम लेने पर वह प्यार से आपका गाल चूम लेता है। “दूसरों के साथ वही व्यवहार करो, जो तुम अपने लिए चाहते हो” यह महा अध्यात्म वाक्य है। इसे जीना ही जीना है। वरना सांसों का क्रम तो केंचुए को भी मिला हुआ है। जमीन पर नाक रगड़ते हुए आदमी और केंचूए के अन्तर को खत्म करने के लिए आदमी को आदमी तक उठना ही होगा। “मुझे अपना शरीर जैसा प्यारा है उतना ही सभी प्राणियों को अपना शरीर प्रिय है। यह समझकर समस्त प्राणियों के प्रति प्रेम रखना चाहिए।” स्वयं का स्वयं से सब प्राणियों तक का विस्तार। इतनी उदात्त भावना रखने वाले ग्रन्थों को मानने वाला जैन कैसे हो जाता है आदमी से? समझ ही नहीं आता कि वह धर्म से अधर्म में कैसे चला जाता है? “सबके भितर एक ही आत्मा है।” फिर आदमी आदमी में भेद कैसा? जैन जैन में, हिन्दू हिन्दू में, मुस्लिम मुस्लिम भर में भाईचारा क्यों? यह धर्म हत्या, अध्यात्म हत्या क्यों? धर्म के उत्कृष्ट रूप में परिशुद्ध रूप में एक ही पावन प्रेम की धारा चहुंदिशि प्रवाहित हो रही है। इस उत्कृष्ट रूप के प्रति आंखें मूंदने पर ही हम हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि होते हैं। हमें आखें खोलनी होंगी। ये घेरे भस्म करने होंगे। अहिंसा या महाप्रेम जीना होगा। चाहे शत्रु हो, चाहे मित्र, चाहे दुश्मन हो, चाहे मीत, सभी जीवों पर, सभी प्राणियों पर समभाव रखना, सबको अपने जैसा समझना ही अहिंसा है। डहरे य पाणे बुड्ढे य पाणे। ते आत्तओ पासई सब्ब लोए।। “छोटे ये जीव, बड़े ये जीव, इसी एक तार पिरोए हुए हैं।” यह तार निष्कपट, घेराहीन, उन्मुक्त प्रेम का है। इस तार में बन्ध जाओ मानव! तुम आत्मदीप हो जाओगे। अपने आपसे भी ऊपर उठकर इन्सान सन्त बनता है। और एक सन्त की कामना होती है- “हे परम पावन प्रभो! मुझे अपनी दिव्य शान्ति का उपकरण बना दे। कि जहां घृणा है वहां प्रेम, जहां युद्ध है वहां क्षमा, जहां दुराव है वहां लगाव, जहां असत्य है वहां सत्य, जहां शंका है वहां विश्वास, जहां निराशा है वहां आशा, जहां अन्धेरा है वहां प्रकाश और जहां उदासी है वहां मैं खुशियों ला सकूं।” 41मानव होने का अर्थ ही यही है कि वह क्षमा, सत्य, प्रेम, विश्वास, प्रकाश और खुशियों का आगार हो। इन्सान जग में वही बांट सकता है जो उसके पास होता है। हमें देखना है कि हमें घेरे बांटने हैं या उन्मुक्ति, संकीर्णता बांटनी है या उदात्तता, चौपायापन बांटना है या दोपायापन। हम अपने में मानवता भर लें। हमारे जीवन में मानवता ही इत उत बिखरेगी। सूरज में रौशनी भरी है, वह रौशनी बिखेरता है। बादलों में जल भरा है, वे जल बरसाते हैं। फूलों में खुशबू भरी है, सौंदर्य भरा है; वे खुशबू, सौंदर्य छितरते हैं। बुलबुल में गीत भरे हैं, वह गीत बिखेरती है। धरती में उर्वरा शक्ति भरी है, वह हरितमा फैलाती है। इन्सान में इन्सानीयत भरी है, उसे इन्सानियत ही बिखेरनी है। उसका और कोई विकल्प हो ही नहीं सकता। अन्य सब विकल्प अस्थाई हैं। ओढ़े हुए हैं। इन गलत विकल्पों को, ओढ़ी खालों को उतारना होगा। इन्सान को इन्सानियत से मानव को मानवता से, आदमी को आदमीयत से दैदीप्यमान करना ही होगा। “आओ हम मज्दा के अधिकारी बनकर अपने को सदा ताजा और चैतन्य महसूस करें। हम विश्व को आगे बढ़ाएं। उषा के, सत्य के, विश्वव्यापी प्रेम के हम सन्देशवाहक बनें। जिससे हम चिश्ती की ओर, ज्ञान के आलोक की ओर सम्पूर्णता से बढ़ सकें।” 42 ज्ञान के आलोक की ओर सम्पूर्णता से बढ़ पाना तब सम्भव होगा, जब हम विश्वव्यापी प्रेम धारण करेंगे। सत्य, प्रेम, करुणा वे भाव हैं जिन्हें कोई नहीं घेर सकता है। ये भाव मानव ने संकीर्ण कर दिए हैं। इन्हें धारण करके विस्तृत होने की अपेक्षा, इन्हें घेरने की घिनौनी कोशिश की है। मानव आज भिखारी है एषणाओं का, भौतिकता का, जर-जेर-जेवर का। हमें मानव महान को वापस लौटाना है, वहां तक जहां मानव कह उठे। “हे करुणामय! हे प्रभु महान! तू हमें सत्य दे, प्रेम दे, करुणा दे।” भरपूर सत्य, भरपूर प्रेम, भरपूर करुणा जहां है वहीं इन्सानियत है। हम अपने अपने पैमाने में बन्ध गए हैं। इन्ही पैमानों से हम दूसरों को नापते हैं। हम यह भी चाहते हैं कि दूसरे भी हमें हमारे ही पैमानों से नापें। पर दूसरों के पास उनके पैमाने हैं और वे उनसे हमें नापते हैं। और चाहते हैं कि उनसे ही उनको नापा जाए। बस यही साम्प्रदाईकता है। यही अधर्म, अज्ञान है जो मिटाना है, समाप्त करना है। ये पैमाने बदलनें होंगे, यदि हमें धार्मिक होना है। एक दो फुट के पैमानों से सागर नापने का प्रयास छोड़ना होगा। एक दो फुट के पैमाने से हम सागर नहीं, अपना पैमाना नापते हैं। सब पैमानों को पहले एक नाप का करना होगा। न केवल एक नाप का, वरन् शाश्वत करना होगा। ऋत करना होगा। सब पैमानों को मानवता का स्वरूप देना होगा। तब किसी को नापना होगा। मानवता के परिशुद्ध पैमाने से यदि हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध को नापा जाए तो सब बौने ही निकलेंगे। बौने पैमानों से नापकर बौनों को बड़ा कहना समझदारी की बात नहीं है। मानवता अपनी देवी है ज्ञान हमारा भैया है धरती अपनी मैया है महनत अपनी बहना है हमें धरती मां की गोदी में सत्य जीवन साथी संग जय विश्व जीते रहना है (~क्रमशः) स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय पी.एच.डी. (वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752) Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. Required fields are marked *Comment * Name * Email * Website Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment.