राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी December 16, 2019 By Arun Aryaveer 17 दिसंबर देश की स्वतन्त्रता के लिये हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर करने वाले प्रतिभावान क्रान्तिकारी, देशप्रेम, फौलादी इच्छाशक्ति और दृढ़ निश्चय के प्रतीक अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का बलिदान दिवस है। बंगाल (आज का बांग्लादेश) के पबना जिला अन्तर्गत मोहनपुर गाँव में 23 जून 1901 को जन्मे राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को देश-प्रेम और निर्भीकता की भावना विरासत में मिली थी। उनके जन्म के समय उनके पिता क्रान्तिकारी क्षितीश मोहन लाहिडी व बडे भाई बंगाल में चल रही अनुशीलन दल की गुप्त गतिविधियों में योगदान देने के आरोप में कारावास की सलाखों के पीछे कैद थे। दिल में राष्ट्र-प्रेम की चिन्गारी लेकर मात्र नौ वर्ष की आयु में ही वे बंगाल से अपने मामा के घर वाराणसी पहुँचे। राजेन्द्रनाथ इस धार्मिक नगरी में पढाई करने गये थे किन्तु दैवयोग से वहाँ पहले से ही निवास कर रहे सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आ गये। राजेन्द्र की फौलादी दृढ़ता, देश-प्रेम और आजादी के प्रति दीवानगी के गुणों को पहचान कर शचीन दा ने उन्हें अपने साथ रखकर बनारस से निकलने वाली पत्रिका बंग वाणी के संपादन का दायित्व तो दिया ही, अनुशीलन दल की वाराणसी शाखा के सशस्त्र विभाग का प्रभार भी सौंप दिया। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए उन्हें हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन की गुप्त बैठकों में आमन्त्रित भी किया जाने लगा। क्रान्तिकारियों द्वारा चलाये जा रहे स्वतन्त्रता-आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था को देखते हुए शाहजहाँपुर में दल के सामरिक विभाग के प्रमुख पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के निवास पर हुई बैठक में राजेन्द्रनाथ लाहिडी भी सम्मिलित हुए जिसमें सभी क्रान्तिकारियों ने एकमत से अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना को अन्तिम रूप दिया था। इस योजना में लाहिडी का अहम् रोल था| काकोरी काण्ड के बाद बिस्मिल ने उन्हें बम बनाने का प्रशिक्षण लेने बंगाल भेज दिया। यहाँ गिरफ्तारी के बाद उनपर मुकदमा दायर किया जिसमें पहले 10 वर्ष की सजा हुई जो बाद में अपील करने पर घटाकर 5 वर्ष कर दी गयी। यहाँ से उन्हें काकोरी काण्ड में शामिल करने के लिये लखनऊ लाया गया। तमाम अपीलों व दलीलों के बावजूद सरकार टस से मस न हुई और अन्तत: राजेन्द्रनाथ लाहिडी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह- एक साथ चार व्यक्तियों को फाँसी की सजा सुना दी गयी। लाहिड़ी को सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने, सरकार का तख्ता पलटने और रेलवे खजाना लूटने के आरोप में 17 दिसंबर 1927 को गोण्डा जिला कारागार में निर्धारित तिथि से दो दिन पूर्व फाँसी पर लटकाकर मार दिया गया। आजादी के इस दीवाने ने हँसते-हँसते फाँसी का फन्दा चूमने से पहले वंदे मातरम् की हुंकार भरते हुए कहा था- “मैं मर नहीं रहा हूँ,बल्कि स्वतन्त्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ।” इस अमर शहीद को कोटिशः नमन| ~ लेखक : विशाल अग्रवाल ~ चित्र : माधुरी Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. Required fields are marked *Comment * Name * Email * Website Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment.