राजधर्म June 24, 2019 By Arun Aryaveer मंच पर आसीन आदरणीय महानुभावों एवं मान्यवर श्रोताओं तथा प्यारे मित्रों आज मैं राजधर्म के विषय में अपने कुछ विचार आपके समक्ष रखना चाहता हूँ। प्रजा के प्रति राजा के कर्त्तव्य को राजधर्म कहते हैं। राज्य करने का अधिकार न्यायप्रिय, वेद को मानने वाले क्षत्रिय को है। राज्य के अन्तर्गत तीन सभाएँ होती हैं। उनके नाम हैं- 1. विद्या सभा, 2. धर्म सभा, 3. राज सभा। तीनों सभाएँ राजा के अधीन होती हैं तथा राजा तीनों सभाओं के आधीन होता है। वेद के विद्वान् विद्यासभा के अधिकारी होते हैं। धर्म सभा का अधिकारी धार्मिक और विद्वान् होना चाहिए। धार्मिक व्यक्ति जो दण्डनीति और न्याय की नीति को जानता हो, वह राज सभा का अधिकारी बन सकता है। राजा में ये गुण होने चाहिए- राजा वेद का विद्वान्, शूरवीर, पक्षपात रहित, दुष्टों का नाश करने वाला, श्रेष्ठ पुरुषों का सम्मान करने वाला और प्रजा को सन्तान के समान समझने वाला होना चाहिए। धर्म की स्थापना के लिए दण्ड व्यवस्था आवश्यक है। वेद विद्या से रहित मूर्ख, अधार्मिक व्यक्तियों को सभा में नियुक्त नहीं करना चाहिए। राजा को निम्न बुराइयों से दूर रहना चाहिए- 1. जुआ खेलना, 2. नशा करना, 3. अधर्म, 4. निन्दा, 5. बिना अपराध के दण्ड देना। वेद आदि शास्त्रों को जानने वाला, अपने देश में उत्पन्न, उत्तम धार्मिक व्यक्ति को मन्त्री बनाना चाहिए। राजदूत निर्भीक, कुशल वक्ता, छल-कपट से रहित और विद्वान् होना चाहिए। अत्यन्त घायल, दुःखी, शस्त्र से रहित, भागने वाला योद्धा, हार स्वीकार करने वाले को युद्ध में नहीं मारना चाहिए। उन्हें बन्दी बनाकर जेल में डाल देना चाहिए। पराजित शत्रुओं को भोजन, वस्त्र व औषधि देनी चाहिए। जिनसे भविष्य में हानि की सम्भावना हो उन्हें जीवन भर कारागार में ही रखना चाहिए तथा उनके परिवार की सुरक्षा करनी चाहिए। राजा का परम धर्म प्रजा का पालन करना है। बुद्धिमान, कुलीन, शूरवीर, धैर्यवान् व्यक्ति से शत्रुता नहीं करनी चाहिए। राजधर्म को ही राजनीति कहते हैं, इसलिए राजनीति धर्म से अलग नहीं है। आज विश्वभर में प्रजातन्त्र का प्रचलन है, जो विश्व इतिहास में शासन प्रणाली की दृष्टि से सबसे घटिया तन्त्र है। प्रजातन्त्र की सबसे बड़ी खामी मताधिकारों द्वारा हर कुछ का औसतीकरण किया जाना है। अर्थात् अयोग्य कुपात्र सुपात्र अतियोग्य का मत कभी एक बराबर नहीं हो सकता। वैसे भी विश्व प्रजातन्त्र में मत देनेवालों से न देनेवालों का प्रतिशत ही अपवाद छोड़ अधिक रहा है। इस दृष्टि से प्रजातन्त्र अपने आप में विफल है। स्थापित पक्षों के दबाव-समूहों द्वारा सामाजिक शोषण, भ्रष्टाचार अयोग्यों द्वारा योग्यों पर शासन आदि अनेकों बुराइयाँ प्रजातन्त्र की लाइलाज बीमारियाँ हैं। इस लिए विद्यार्यसभा धर्मार्यसभा राजार्यसभा संचालित सुयोग्यों द्वारा वैदिक राजतन्त्र प्रणाली ही सर्वोत्कर्ष का कारण बन सकती है। Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. Required fields are marked *Comment * Name * Email * Website Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment.