बसंत कुमार विश्वास December 2, 2019 By Arun Aryaveer कल 11 मई को क्रांतिधर्मा बसंत कुमार विश्वास का बलिदान दिवस था पर दुखद कि हम में से किसी ने उन्हें याद नहीं किया। 6 फरवरी 1895 को पश्चिम बंगाल के नादिया जिले के पोरागाछा गाँव में एक साधारण परिवार में जन्में बंसत कुमार बिस्वास उस समय के प्रसिद्द क्रान्तिधर्माओं अमरेन्द्रनाथ चटर्जी एवं रास बिहारी बोस के प्रभाव में आकर प्रसिद्द क्रांतिकारी संगठन युगांतर में शामिल हो गए और शीघ्र ही संगठन की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। रासबिहारी बोस के निर्देश पर संगठन ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित किये जाने के उपलक्ष्य में हो रहे समारोहों के अंतर्गत तत्कालीन वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग के जुलूस में बम फेंककर उसे मारने और अंग्रेजी सरकार के मन में भय उत्पन्न करने का निश्चय किया। संगठन के निर्देशानुसार बंसत कुमार ने 23 दिसंबर 1912 को एक स्त्री का वेश बनाकर हार्डिंग पर बम फेंका परन्तु क्रांतिकारियों के दुर्भाग्य से वो बच गया। पर इस घटना ने अंग्रेजी सरकार को हिला कर रख दिया। इस घटना के प्रभाव के बारे में अपनी पुस्तक इंडिया अनरेस्ट में चर्चा करते हुए प्रसिद्द अंग्रेजी विचारक और इतिहासकार वैलेंटाइन शिरोल ने लिखा है कि नयी राजधानी में प्रवेश के अवसर पर निकाली जा रही शोभायात्रा में वायसराय पर बम फेंकना निश्चय ही क्रांतिकारियों का एक बहुत बड़ा कदम था, जो तात्कालिक तौर पर भले ही असफल हो गया पर इसने आगे के लिए क्रान्ति का रास्ता तय कर दिया और इस कृत्य से प्रेरणा ले कितने ही युवाओं ने इसी तरह के कितने ही दुस्साहस किये। अंग्रेजी सरकार ने इस घटना, जिसे दिल्ली लाहौर षड़यंत्र कहा गया, के आरोपियों को पकड़ने के लिए दिन रात एक कर दिए परन्तु बंसत कुमार घटनास्थल से फरार होने के बाद पुलिस की पकड़ में नहीं आये। परन्तु 26 दिसंबर 1914 को उन्हें उस समय उनके पैतृक गाँव से गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह अपने पिता का अंतिम संस्कार कर रहे थे। 23 मई 1914 से उन पर दिल्ली में मुकदमा चलाया गया और इसी वर्ष 5 अक्टूबर को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी गयी। परन्तु अंग्रेजी सरकार इससे संतुष्ट नहीं थी क्योंकि वो क्रांतिकारियों के दिलों में डर उत्पन्न करने के लिए बसंत कुमार को फांसी देना चाहती थी। अपने इरादों को मूर्त रूप देने के लिये सरकार ने लाहौर उच्च न्यायालय में अपील की और इसी बीच पंजाब की अम्बाला जेल में मुक़दमे से सम्बंधित रिकार्ड्स में छेड़छाड़ कर उनकी आयु को वास्तविक आयु से 2 वर्ष अधिक दिखा दिया, ताकि उन पर उनके कार्यों का पूरा उत्तरदायित्व डाला जा सके और उन्हें किसी भी प्रकार से बचने का अवसर ना मिले। इस कुकृत्य से सरकार मुकदमा जीत गयी और बंसत कुमार को फांसी की सजा सुना दी गयी। 11 मई 1915 को उन्हें अम्बाला जेल में फांसी पर लटका दिया गया और इस प्रकार भारतमाता के ये पुत्र चिरनिद्रा में लीन हो गया। उन्हें शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि । ~ लेखक : विशाल अग्रवाल~ चित्र : माधुरी Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. Required fields are marked *Comment * Name * Email * Website Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment.