प्रीतिलता वाडेदार December 13, 2019 By Arun Aryaveer 5 मई अमर क्रांतिकारी मास्टर सूर्यसेन की सहयोगी और ब्रिटिश भारत में नारी शक्ति की प्रतीक प्रीतिलता वाडेदार का जन्मदिवस है| उनका जन्म 5 मई 1911 को वर्तमान बंगलादेश के चटगाँव जिले के पाटिया प्रखंड के धलघाट गाँव में चटगाँव नगरपालिका के क्लर्क जगबंधु वाडेदार एवं उनकी गृहणी पत्नी प्रतिभामई देवी के घर हुया था। जगबंधु का सरनेम यूँ तो दासगुप्ता थे पर परिवार के किसी पूर्वज को वाडेदार उपाधि मिलने के कारण अब ये परिवार इसी शब्द का प्रयोग अपने सरनेम के रूप में करता था। प्यार से रानी के नाम से पुकारी जाने वाली प्रीतिलता के तीन बहनें और दो भाई भी थे, जिनके नाम है–कनकलता, शान्तिलता, आशालता, मधसूदन एवं संतोष। शिक्षा को पर्याप्त महत्व देने वाले जगबंधू बाबू ने प्रीतिलता का प्रवेश चटगाँव के प्रसिद्द डाक्टर खास्तगीर गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल में कराया था जहाँ की एक शिक्षिका जिन्हें सब प्यार से उषा दी कहते थे, से प्रीतिलता अत्यंत प्रभावित हुयीं। उषा दी अपनी छात्राओं को रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा जैसी वीरांगनाओं की कहानियां सुनाया करती थी, जिसने प्रीतिलता और उनकी जैसी कई अन्य लड़कियों के मन में राष्ट्रवाद की उदात्त भावना को उत्पन्न कर दिया। प्रीतिलता की सहपाठी और क्रांतिकारी गतिविधियों में उनकी साथी कल्पना दत्त ने एक साक्षात्कार में बताया था कि स्कूल के प्रारम्भिक दिनों में इन सब के सामने ना कोई उद्देश्य था और ना कोई दिशा, परन्तु उषा दी के प्रभाव और उनकी शिक्षाओं ने इन लड़कियों के मन में रानी लक्ष्मीबाई की तरह बनने और देश के लिए कुछ कर गुजरने का संकल्प उत्पन्न किया। प्रीतिलता अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के छात्रा थीं और 1928 में उन्होंने मैट्रीकुलेशन की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। 1929 में ईडेन कालेज, ढाका से पढ़ाई करते हुए उन्होंने इंटर की परीक्षा में पूरे ढाका बोर्ड में प्रथम स्थान प्राप्त किया था| अध्ययन के साथ साथ अन्य पाठ्य सहगामी क्रियायों और सामाजिक कार्यों में भी वे बढ़ चढ़ कर भाग लेती थीं। दो वर्ष बाद उन्होंने कोलकाता के बेथ्युन कालेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक की परीक्षा डिस्टिंक्शन के साथं उत्तीर्ण की पर कोलकाता विश्वविद्यालय ने उनकी डिग्री रोक ली, जो स्वतंत्र भारत में उन्हें, एक अन्य क्रांतिकारी बीना दास के साथ, मरणोपरांत 2012 में इस विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की गयी| उन दिनों चटगाँव और आस पास के क्षेत्रों में मास्टर सूर्यसेन और उनके संगठन का अच्छा खासा प्रभाव था और ये लोग अनेकों क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देते रहते थे। प्रीतिलता जब आठवीं की छात्रा थीं, तब उन्होंने रेलवे का धन लूटने के आरोप में हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़े मास्टर सूर्यसेन को पहली बार देखा और इसने उनके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला और उनके अन्दर की देशभक्ति की भावना को हवा दी। उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य को पढना और गुनना शुरू कर दिया जिसने उनके मन में कुछ कर गुजरने के संकल्प पैदा किया। ढाका में रहते हुए वे राष्ट्रवादी विचारों वाले महिला संगठन दीपाली संघ से जुड़ गयीं जिसकी सदस्याएं कई क्रांतिकारियों को हर संभव सहायता दिया करती थीं। बाद में क्रांतिकारी विचारों वाले अपने एक भाई के जरिये प्रीतिलता भी मास्टर दा के संगठन के संपर्क में आयीं और समूह के कार्यों में थोडा बहुत सहयोग करने लगीं। उन्ही दिनों चटगाँव के इन्स्पेक्टर जनरल मिस्टर क्रैग के काले कारनामों के कारण इस समूह ने उसकी हत्या करने का निश्चय किया और इसका उत्तरदायित्व रामकृष्ण विश्वास और कलिपदा चक्रवर्ती को सौंपा गया। इन दोनों ने भूलवश क्रैग के स्थान पर इंस्पेक्टर तारिणी मुखर्जी को मार डाला। विश्वास और चक्रवर्ती दोनों को ही 2 दिसंबर 1931 को गिरफ्तार कर लिया गया और मुक़दमे के बाद विश्वास को फांसी और चक्रवर्ती को काला पानी की सजा सुनाई गयी। निर्धनता के कारण रामकृष्ण विश्वास के परिजन और मित्र कलकत्ता की अलीपुर जेल में बंद उनसे मिलने आने में असमर्थ थे अतः संगठन द्वारा चटगाँव की ही निवासी और उस समय कलकत्ता में रह रही प्रीतिलता से उनसे मिलने जाने के लिए कहा गया और यही सच्चे अर्थों में प्रीतिलता के क्रांतिकारी जीवन का प्रारम्भ सिद्ध हुआ। वे फांसी की प्रतीक्षा करते रामकृष्ण विश्वास से उनकी बहन बन कर लगभग 40 बार मिलीं और रामकृष्ण और उनके क्रांतिकारी विचारों से अत्यंत प्रभावित हुयीं और इसी संपर्क ने उनके मन में देश की आज़ादी के लिए सशस्त्र क्रान्ति का मार्ग अपनाने का विचार उत्पन्न कर दिया। स्नातक की पढ़ाई के उपरान्त वो चटगाँव लौट आयीं और एक स्थानीय अंग्रेजी माध्यम विद्यालय नंदनकानन अपर्णा चरण बालिका विद्यालय की प्रथम प्रधानाचार्या नियुक्त की गयीं पर ये सब उन्हें संतुष्टि नहीं दे सका| उनके मन को ये बात मथथी थी कि आज़ादी की लड़ाई में और खासकर सशस्त्र विद्रोह में महिलाओं का योगदान इतना कम क्यों है और क्यों ऐसा सोचा जाता है कि महिलाएं इस तरह की गतिविधियों में भाग लेने में असमर्थ हैं। उनका विश्वास था कि आज़ादी की लड़ाई तब तक अधूरी है जब तक महिलाएं भी पुरुषों की भाँति इसमें सक्रिय रूप से भाग नहीं लेतीं। यद्यपि मास्टर सूर्यसेन और उनके कुछ वरिष्ठ साथी प्रारम्भ में प्रीतिलता को संगठन में शामिल करने के अनिच्छुक थे पर अंग्रेजी राज्य को समाप्त करने के लिए किसी भी हद से गुजर जाने के उनके जज्बे को देखते हुए मास्टर दा ने उन्हें अपने संगठन में शामिल कर लिया। अब वो सक्रिय रूप से मास्टर सूर्यसेन के समूह से जुड़ गयीं और क्रांतिकारी निर्मल सेन से अनेक तरह के हथियारों का प्रशिक्षण लेने लगीं, जो बाद में एक हमले में शहीद हो गए और जिनका भी प्रीतिलता पर बहुत प्रभाव था| वो मास्टर सूर्यसेन के संगठन द्वारा किये गए अनेकों हमलों जैसे डाक तार कार्यालय पर हमला और जलालाबाद संघर्ष में शामिल रहीं| चटगाँव शस्त्रागार पर हमले के बाद मास्टर दा ने अंग्रेजों से गुरिल्ला युद्ध पद्धति से लड़ने का निश्चय किया। विचार विमर्श के लिए प्रीतिलता उनसे मिलने उनके छिपने के ठिकाने धलघाट गयीं पर अंग्रेजों को किसी तरह भनक लग गयी और उन्होंने इन मास्टर दा को घेर लिया। इस संघर्ष में मास्टर दा और प्रीतिलता तो किसी तरह बच कर निकल गए पर प्रीतिलता को शस्त्र प्रशिक्षण देने वाले निर्मल सेन और अपूर्व सेन मरे गए। अब तक प्रीतिलता का नाम मोस्ट वांटेड की सूची में शामिल हो चुका था और इसलिए वो कल्पना दत्त के साथ भूमिगत हो गयीं। 1932 में मास्टर दा ने कुख्यात पहारताली यूरोपियन क्लब पर हमला करने के योजना बनायीं, जिसके प्रवेश द्वार पर लगा ये बोर्ड कि कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित है, हर भारतीय के हृदय को चोट पहुंचाता था। मास्टर दा ने इस मिशन का नेतृत्व एक महिला को देने का मन बनाया हुआ था और कल्पना दत्त की गिरफ्तारी के कारण ये उत्तरदायित्व प्रीतिलता को सौंपा गया, जिन्होंने मिशन की सफलता के लिए कई दिनों तक शस्त्र प्रशिक्षण लिया और हमले की पूरी योजना बनायी। हमले के लिए 23 सितम्बर 1932 का दिन निश्चित किया गया और हमला करने वाले दल के सभी सदस्यों को पोटेशियम सायनाइड इस निर्देश के साथ दिया गया कि पकडे जाने की स्थिति आने पर उसे निगल कर प्राणोत्सर्ग कर दें पर किसी भी कीमत पर अंग्रेजों के हाथ ना आयें। नियत दिन प्रीतिलता ने स्वयं को एक पंजाबी पुरुष का रूप दिया, उनके साथियों कालीशंकर डे, बीरेश्वर रॉय, प्रफुल्ल दास, शान्ति चक्रवर्ती ने धोती और शर्ट तथा महेंद्र चौधरी, सुशील डे और पन्ना सेन ने लुंगी और शर्ट पहनी। रात 10.45 को इस दल ने तीन तरफ से क्लब पर हमला कर दिया। उस समय क्लब में लगभग 40 लोग थे जिनमें कुछ पुलिस अधिकारी भी थे। उन्होंने भी पोजीशन संभाल अपनी रिवाल्वरों से प्रत्युत्तर देना शुरू कर दिया। जबरदस्त गोलीबारी के बीच प्रीतिलता जब गोलियों से बुरी तरह से घायल हो गयीं और पूरी तरह से घिर गयीं तो उन्होंने अपने साथियों को वहां से फरार होने के लिए पूर्व निर्धारित संकेत किया और धूर्त अंग्रेजी अधिकारियों की पकड़ से बचने के लिए स्वयं पोटेशियम साइनाइड खा कर आत्मोत्सर्ग कर दिया| अगले दिन पुलिस को उनका पार्थिव शरीर पड़ा मिला जिसकी तलाशी लेने पर गोलियां, कुछ पत्रक, हमले की योजना का खाका, सीटी और रामकृष्ण विश्वास के चित्र मिले। इस तरह मात्र 21 वर्ष की आयु में वो देश के लिए अपने जीवन का बलिदान कर गयीं और प्रेरणा दे गयीं अनगिनत युवाओं और युवतियों को देश पर सर्वस्व न्योछावर करने की| प्रीतिलता ने आज़ादी की लड़ाई में महिलाओं की भूमिका को एक नयी दिशा और नयी पहचान दी। उन्हें शस्त्र संघर्ष करते हुए देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने वाली प्रथम महिला माना जाता है। उन्होंने अंग्रेजों पर हमले में महिलाओं की सहायक भूमिका से अलग एक नयी भूमिका का सृजन किया और सीधे सीधे संघर्षों में शामिल हुयीं। बंगलादेशी लेखिका सेलिना हुसैन ने प्रीतिलता को प्रत्येक स्त्री का आदर्श बताया है। उनकी स्मृति में वीरकन्या प्रीतिलता ट्रस्ट नामक न्यास का निर्माण किया गया जिसके द्वारा हर वर्ष बंगलादेश और भारत के कई स्थानों पर प्रीतिलता का जन्मदिवस मनाया जाता है। चटगाँव के बोलखाली प्रखंड में एक सड़क का नाम उनकी याद में प्रीतिलता वाडेदार रोड रखा गया है और साथ ही प्रीतिलता वाडेदार नाम से एक विद्यालय की स्थापना की गयी है। चटगाँव विद्रोह को दर्शाने वाली 2010 में प्रदर्शित फिल्म ‘खेलें हम जी जान से’ और 2012 में प्रदर्शित फिल्म ‘चटगाँव’ में भी उनके चरित्र को बखूबी दिखाया गया। इन दोनों फिल्मों में उनका चरित्र क्रमशः विशाखा सिंह और वेगा तामोतिया ने निभाया है। इस अमर वीरांगना को कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि| ~ लेखक : विशाल अग्रवाल~ चित्र : माधुरी Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. 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