पाठ (१) प्रथमा विभक्ति December 21, 2019 By Arun Aryaveer संस्कृतं वद आधुनिको भव। वेदान् पठ वैज्ञानिको भव।। पाठ (१) प्रथमा विभक्ति कर्त्तृवाच्य में कर्त्ता (=क्रिया को करनेवाला) कारक में प्रथमा विभक्ति होती है यथा- विक्रमः पठति = विक्रम पढ़ता है/ पढ़ रहा है। माला पचति = माला पकाती है/ पका रही है। उपाध्यायः आगच्छति = उपाध्याय आ रहा है/ रहे हैं। कुक्कुरः शेते = कुत्ता सो रहा है। मार्जारः पिबति = बिल्ली पी रही है। पक्षिणः उड्डयन्ति = पक्षी उड़ रहे हैं। अहं गच्छामि = मैं जा रहा हूं/ जा रही हूं। आवां यजावः = हम दोनों यज्ञ कर रहे हैं/ कर रही हैं। वयं उपविशामः = हम सब बैठ रहे हैं/ रही हैं। गोपालः दोग्धि = गोपाल दुह रहा है। शाकविक्रेता विक्रीणाति = सब्जी बेचनेवाला बेच रहा है। ग्राहकः क्रीणाति = ग्राहक खरीद रहा है। भक्तः प्रार्थयति = भक्त प्रार्थना कर रहा है। त्वं सत्यापयसि = तू सत्य कह रहा है/ रही है। युवां यमयतः = तुम दोनों यम का पालन कर रहे हो/ रही हो। यूयं नियमतः = तुम सब नियम का पालन कर रहे हो/ रही हो। सः शब्दायते = वह शोर कर रहा है। तौ कलहायेते = वे दोनों लड़ रहे हैं। ते करुणायन्ते = वे सब करुणा की अनुभूति कर रहे हैं। कुम्भकारः घटयति = कुम्हार घड़ा बना रहा है। तन्तुवायः वस्त्रयति = जुलाहा कपड़ा बुन रहा है। चित्रकारः चित्रयति = चित्रकार चित्र बना रहा है। भर्जकः भर्जयति = बड़भुजा (भूननेवाला) भून रहा है। सूचिकः सिव्यति = दरजी सिलाई कर रहा है। चर्मकारः निर्मापयति = चमार बना रहा है। माता सम्भाण्डयते = माता बर्तनों को ठीक रख रही है। भगिन्यौ वस्त्रस्त्रयतः = दो बहनें कपड़े धो रही हैं। गृहस्थः तपस्यति = गृहस्थ जपस्या कर रहा है। बालः सुखायते = बच्चा सुख की अनुभूति कर रहा है। वाष्पस्थाली वाष्पायते = कुकर में से भाप निकल रही है। रेलयानं ध्रूम्रायते = रेलगाड़ी से धूंआ निकल रहा है। बालः उत्सुकायते = बालक उत्सुकता दिखा रहा है/ उत्सुक है। नेत्रे लोहितायेते = दोनों आंखें लाल हो रही हैं। मूर्खः पण्डितायते = मूर्ख पडित जैसा आचरण/व्यवहार कर रहा है। पाचिका पिपक्षति = भोजन पकानेवाली पकाना चाहती है। तृषितः पिपासति = प्यासा पीना चाहता है। विद्यार्थी पिपठिषति = विद्यार्र्थी पढ़ना चाहता है। जिज्ञासु जिज्ञासति = जिज्ञासु जानना चाहता है। शिष्या पिपृच्छिषति = शिष्या पूछना चाहती है। रोगी मुमूर्षति = रोगी मरना चाहता है। द्रष्टा दिदृक्षते = देखनेवाला देखना चाहता है। बाला रुरुदिशति = बच्ची रोना चाहती है/ रोनेवाली है। जेता जिगीषति = जीतनेवाला जीतना चाहता है। उपासकः उपासिषते = भक्त उपासना करना चाहता है। श्रान्तः सुषुप्सति = थका हुआ व्यक्ति सोना चाहता है। स्वसा पापच्यते = बहन बार-बार पकाती है/ खूब पकाती है। धावकः दाधाव्यते = दौड़नेवाला खूब दौड़ता है/बार-बार दौड़ता है। अग्निः जाज्वल्यति = अग्नि खूब तप रही है। सूर्यः दोधूप्यते = सूर्य खूब तप रहा है। सेविका सिषेव्यते = सिलाई करनेवाली खूब सिलती है/ बार-बार सिलती है। रजकः पाप्रक्षाल्यते = धोबी बार-बार धोता है/खूब धोता है। वाचालः वावद्यते = जल्पी (बकवादी) बहुत बोलता है। चलचित्रदर्शी दरीदृश्यते = सिनेमा देखने का शौकीन खूब/ बार-बार देखता है। कृषकः करीकृष्यते = किसान बार-बार हल जोतता है। प्रबुद्ध पाठकों से निवेदन है कृपया त्रुटियों से अवगत कराते नए सुझाव अवश्य दें.. ‘‘आर्यवीर’’ अनुवादिका : आचार्या शीतल आर्या (पोकार) (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, आर्यवन न्यास, रोजड, गुजरात, आर्यावर्त्त) टंकन प्रस्तुति : ब्रह्मचारी अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ (आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद, तेलंगाणा, आर्यावर्त्त) Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. Required fields are marked *Comment * Name * Email * Website Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment.