पाठ : (१२) तृतीया विभक्ति (४) + गुण सन्धिः December 20, 2019 By Arun Aryaveer संस्कृतं वद आधुनिको भव। वेदान् पठ वैज्ञानिको भव।। पाठ : (१२) तृतीया विभक्ति (४) + गुण सन्धिः (क्रिया की विशेषता बतानेवाले शब्द को क्रियाविशेषण कहते हैं क्रियाविशेषण में तृतीया विभक्ति होती है। कहीं अव्यय शब्दों का भी प्रयोग क्रियाविशेषण के रूप में होता है।) ज्ञानी सुखेन जीवती = ज्ञानी सुख से जीता है। महात्मानः स्वभावेन कोमलाः भवन्ति = महात्मा स्वभाव से कोमल होते हैं। गोदुग्धं प्रकृत्या मधुरं भवति = गाय का दूध स्वभावतः मीठा होता है। विना धर्मं धनं च जीवनयात्रा दुःखेन चलति = धर्म और धन के बिना जीवन यात्रा दुःख से चलती है। सन्तोषं विना च दुःखतरेण चलति = और सन्तोष के बिना तो जीवनयात्रा अत्यन्त दुःख से चलती है। वैरागी तु सुखसुखेन जीवति = विरक्त व्यक्ति बहुत सुख से जीता है। व्यापारे हानिः जाता। अहो वराक ! कृच्छ्रेण दिनानि यापयति = व्यापार में नुकसान हुआ.. अरे बेचारा..! कठिनार्ई से दिन बिता रहा है। द्वीपी वेगेन धावति = चीता वेग से दौड़ता है। चपला क्षणेन पलायते = बिजुली पलभर में भाग जाती है। अविरलवारिधारासंपातेन वृष्टिः अभवत् = मूसलाधार बारिश हुई। संयमी संयमेन जीवति तापसश्च तपसा = संयमी संयम से जीता है और तपस्वी तपपूर्वक। परसुखासहिष्णुः दुःखदुःखेन जीवति = ईर्ष्यालु अत्यन्त कष्ट से जीता है। नीचैः गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण = जीवन की दशा पहिए के गोले के समान ऊपर-नीचे होती है। किन्तु धीराः धैर्येण तिष्ठन्ति = परन्तु धीर लोग धैर्यपूर्वक रहते हैं। नाम्ना शीतला अहम् = नाम से ही मैं शीतल हूं (=मेरा नाम शीतल है)। नाम्ना जलनिधिः अस्ति, बिन्दुमपि न पाययति = नाममात्र का सागर है, बून्दभर भी पानी नहीं पिलाता। श्रान्तः घोरया निद्रया शेते = थका हुआ व्यक्ति गहरी नीन्द सो रहा है। विपत्तौ प्रायेण छिद्राः बहुली भवन्ति = गरीबी में आटा गीला। साधुवृत्तानां विपत्तयः प्रायेण अस्थायिन्यो भवन्ति = सदाचारियों के जीवन में आयी हुई विपत्तियां प्रायः करके अस्थायी होती हैं। हृदा उक्तं त्वरया शृणोति भगवान् = दिल से कही बुई बात शीघ्र ही भगवान सुनता है। कर्मफलदाता कर्मफलम् अचिरेण ददाति = कर्मफलदाता कर्मफल को बिना देर किए (= समय पर) देता है। चिरेण शयनं चिरेण जागरणं न शिष्टाचारः = देर से सोना और देर से जगना शिष्टों का आचरण नहीं है। यदृच्छया किमपि न भवति जगति, सर्वं सहेतुकं भवति = अपनेआप संसार में कुछ भी नहीं होता, सबकुछ कारणपूर्वक ही होता है। यौवनपदवीमारूढः सः यानं यदृच्छया चालयति = जवानी के मद में चूर वह गाड़ी को बेछूट चलाता है। यदृच्छया अहमपि तत्र अगमम् = संयोग की बात है, मैं भी वहां गया हुआ / गई हुई था / थी। विपणीपथं गच्छन्तं मां यदृच्छया भवान् अमिलत् = बजार जाते हुए मुझे रास्ते में संयोग से आप मिले। नियमपालनं स्वेच्छया क्रियते स्वेच्छाचारिभिः = मनमौजियों के द्वारा निममों का पालन स्वेच्छापूर्वक किया जाता है। चंचलं प्रमाथि बलवद् दृढं मनः काठिन्येन निगृह्यते = चंचल, मथ देनेवाला, बलवान् हठी मन कठिनाई से पकड़ में आता है। किन्तु विरक्तं मनः सारल्येन निरुध्यते = परन्तु विरक्त मन सरलता से रुक जाता है। पर्वतलुण्ठितः अनायासेन पतत्येव = पर्वत से लुढ़का हुआ अनायास गिरता ही जाता है। धान्येन सह यवसं अनायासेन उद्गच्छति = धान के साथ घास बिना किसी प्रयत्न के ही उग जाता है। प्रकृतिः जगद्रूपेण परिणमते न तु ब्रह्म = प्रकृति जगतरूप में परिणत होती है, ब्रह्म नहीं। शीनकेन पयो दधिभावेन परिणमते = जामन के कारण दूध दहि बन जाता है। धर्म रहिताः मनुष्यरूपेण मृगसदृशाः एव = धर्म से रहित लोग मनुष्यरूप में जंगली पशु के समान ही हैं। त्यक्तेन भुञ्जीथाः = त्यागपूर्वक भोग कर। अल्पेन न तुष्यन्ति तृषाः = प्यासे थोड़े से तृप्त नहीं होते। शान्त्या उपविश मा शब्दं कुरु = शान्ति से बैठ, शोर मत कर ! साधवः सारल्येन वर्तन्ते = साधू लोग सरलता से व्यवहार करते हैं। वाल्मिकी लवकुशौ सावधानेन पर्यपाठयत् = वचाल्मिकी ने लवकुश को सावधानी से पढ़ाया। (क्रियाविशेषण के रूप में अव्ययों का प्रयोग) मन्दं चल, मा त्वर = धीरे चल, जल्दी मत कर। मन्दं मन्दं गीतं गुनगुनायते गीता = गीता मन्द स्वर में गीत गुनगुनारही है। मा तिष्ठ, शीघ्रं चल..! = मत रुक, जल्दी चल..! चिरं भवति, शीघ्रं शीघ्रं कथं न चलसि ? = देर हो रही है, जल्दी-जल्दी क्यों नहीं चलता है ? कालं मा यापय, त्वरितं उत्तर..! = समय मत बिगाड़, जल्दी जबाब दे..! वैद्यलिपीं मा प्रयुङ्क्ष्व, सुष्ठु लिख..! = डॉक्टर की सी शैली में मत लिख, सुन्दर अक्षरों में (= सुलेख) लिख..! द्रुतम् एहि, कोऽपि द्रक्ष्यति..! = जल्दी आ जा, कोई देख लेगा..! पित्रे सविनयं प्रणिपातय माम्..! = पिता को विनयपूर्वक मेरा प्रणाम कहना..! तत्र भवन्तं सादरं प्रणमामि..! = हे पूजनीय, मेरा आप को सादर प्रणाम है..! दृढं बध्नातु रज्जुं, मा उद्घटेत् = रस्सी मजबूती से बांधना खुल न जाए..! वचो मा भ्रामय, सरलं वद..! = बात मत घुमा, सीधे बोल..! न अवगम्यते किं वदति इति, स्पष्टं वद..! = क्या कह रहा है पता नहीं चल रहा है, अतः साफ-साफ कहो..! तूष्णीं तिष्ठ, कोऽपि श्रोष्यति..! = चुप बैठ, कोई सुन लेगा..! निश्श्ब्दं भव, श्रान्तो भविष्यति..! = चुप रहो वरना थक जाओगे..! आस्तामत्र तावत्, निरवं प्रतीयते स्थानम् = यहां बैठो, शान्त जगह लग रही है। जोषम् आस्ताम्, शिरोर्त्तिः बाधते = चुपचाप बैठ, सिरदर्द हो रहा है। जोषं कुरु, स्वतन्त्रोऽसि = इच्छानुसार कर, स्वतन्त्र है तू। जोषं वद, शीघ्रता नास्ति = आराम से बोल, जल्दी नहीं है। शनैः चल, कथं त्वरायसे ? = आराम से चल, क्यों जल्दी मचा रहा है ? शनैः भाषस्व, कुड्यमपि शृणोति कदाचित् = धीमे आवाज में बोल, दीवारों के भी कान होते हैं। शनैः शनैः धर्मं संचिनुयाद् = धीरे-धीरे धर्म का संचय करे। मृषा जल्पति = व्यर्थ बकवास करता है। मृषा मा व्याहर = झूठ मत बोल। इद्धा ब्रूहि किम् इच्छसि ? = साफ बताओ क्या चाहते हो ? शाखां नीचैः कृत्वा दृढबीजं त्रोटयति = डाली को झुकाकर अमरुद तोड़ रहा है। अहो ! रिक्तगुरु पात्रम्, नीचैः स्थापय = खाली होने पर भी कितना वजनदार पात्र है यह, इसे नीचे रख दे..! उच्चैः मा आक्रोश, शिशुः शेते = शोर मत मचा, बच्चा सो रहा है। निश्चप्रचं विजेष्यन्ते शूरा बाह्यान्तरान् रिपुन् = निश्चय ही शूरवीर बाहर और भीतर के दुश्मनों को जीतेंगे। छिन्नोऽपि वंशवृक्षः पुनः रोहति = काट देने पर भी बांस फिर उग आया। वृथा यतते यत् मूर्खान् उपदिशति = मूर्खों को उपदेश करना निरर्थक प्रयत्न है। मृषा भोजयति कुपुत्रम् = कपूत को खिलाना व्यर्थ है। मृषा वदति वादी = वादी झूठ बोल रहा है। मुधा मा वद, पतिष्यति..! = झूठ मत बोल, पतन होगा..! ज्योक् जीव..! = दीर्घजीवी हो..! ज्योक् पश्येम सूर्यमुच्चरन्तम् = हम सदा देखें हृदय में विद्यमान (उपस्थित) प्रेरक को। मिथ्या मा कुरु पदम्, सम्यक् लिख = शब्द को गलत मत कर ठीक से लिख। प्रायः समापन्नविपत्तिकाले धियोऽपि सुधीनां मलिनी भवन्ति = विपत्तिकाल आने पर प्रायः विद्वानों की बुद्धि भी मलिन (= अच्छे-बुरे, उचितानुचित का विवेक न कर पाना) हो जाया करती है। भूयो भूयो नमाम्यहं देवम् = दाता को बारम्बार मेरा प्रणाम। भूयश्च शरदः शतात् = सौ वर्षों से भी अधिक जीएं। उपभोगेन कामः भूयोऽभिवर्धते = भोग से कामना (= इच्छाएं) और अधिक बढ़ती हैं। शुकं धावति घोटकः = घोड़ा तेज दौड़ रहा है। सुकं तु शोभते व्यायामी संयमी दमी = व्यायाम करनेवाला, इन्द्रियसंयम करनेवाला मनोनियन्त्रण करनेवाला मनुष्य अतिशय शोभा को प्राप्त होता है। दाता वसु मुहुर्मुहुर्दाशुषे ददाति = दाता ईश्वर देनेवाले को बार बार धन देता है। अभीक्ष्णं चिन्तयति राष्ट्रं जागरूकाः = जागरूक नागरिक राष्ट्र की लगातार चिन्ता करते हैं। मनाग् ददाति कृपणः = कंजूस थोड़ा देता है। बालः सामि खादति सामि क्षिपति = बच्चा आधा खाता है, आधा फेंकता है। संस्कृतानुवादपाठिभ्यः भूरि भूरि धन्यवादाः = संस्कृतानुवाद पढ़नेवालों को बहुत बहुत धन्यवाद। गुणसन्धिः {आद्गुणः। अ, ए, ओ इन तीन वर्णों की गुण संज्ञा है। अर्थात् इन तीनों को ‘गुण’ कहते हैं। अ अथवा आ के बाद इ अथवा ई हो तो दोनों (अ/आ+इ/ई) के स्थान पर ‘ए’, उ/ऊ हो तो दानों के स्थान पर ‘ओ’, ऋ/ॠ हो तो दोनों के स्थान पर ‘अर्’, तथा लृ हो तो दोनों के स्थान पर ‘अल्’ हो जाता है।} अ / आ + इ / ई = ए; मह् आ + ई शः = मह् ए शः = महेशः। अ / आ + उ / ऊ = ओ; पर् अ + उ पकारः = पर् ओ पकारः = परोपकारः। अ / आ + ऋ / ॠ = अर्; मह् आ + ऋ षिः = मह् अर् षिः = महर्षिः। अ / आ + लृ = अल्; = तव् अ + लृ कारः = तव् अल् कारः = तवल्कारः। का + इदानीम् = केदानीम्। केदानीं वेला ? वेला अस्ति भोक्तुम् = अभी क्या समय हुआ है ? भोजन का समय हुआ है। का ईशा = केशा। केशा अस्ति केशानाम् = लम्बे बालोंवाली महिला कौन है ? काक + ईश्वरः = काकेश्वरः। काकेश्वरः काकसभम् अकार्षीत् = कौओं के मुखिया ने कौओं की सभा बुलाई। पश्य + इदानीम् = पश्येदानीम्। पश्येदानीं संध्याकालः संजातः, ईश्वरम् उपास्स्व..! = देख अभी संध्याकाल हो गया है, ईश्वर की उपासना कर..! चन्द्र + उज्ज्वलाः = चन्द्रोज्ज्वलाः। केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः = मानव की शोभा न तो बाजूबन्द से है न हि चन्द्र के समान चमकते हार से होती है। विद्या + उत्तमाः = विद्योत्तमा। सा विद्योत्तमा या मूर्खकालिदासं कविकालिदासं करोति = जो मूर्ख कालिदास को कवि कालिदास बनाती है, वह स्त्री स्त्री उत्तम विद्यावाली मानी जाती है। क्षेत्र + ऊर्वरम् = क्षेत्रोर्वरम्। क्षेत्रोर्वरं दृष्ट्वा बीजं वपेत् = उर्वर भूमि में बीज बोना चाहिए (= पात्र को दान देना चाहिए)। ब्रह्म + ऋषिः = ब्रह्मर्षिः, राज + ऋषिः = राजर्षिः। वशिष्ठः ब्रह्मर्षिः बभूव विश्वामित्रश्च राजर्षिः = वशिष्ठ ब्रह्मर्षि थे और विश्वामित्र राजर्षि। महा + ऋषिः = महर्षिः। विजयतां महर्र्षिदयानन्दः येन संसारः निबोधितः = महर्षि दयानन्द जी की जय हो जिसने संसार को जगाया। तव + लृकार = तवल्कार, तवल्कार + उच्चारणम् = तवल्कारोच्चारणम्। तवल्कारोच्चारणं सम्यक् नास्ति, सुष्ठु कुरु = तेरा लृकार का उच्चारण ठीक नहीं है, उसे ठीक करो। प्रबुद्ध पाठकों से निवेदन है कृपया त्रुटियों से अवगत कराते नए सुझाव अवश्य दें.. ‘‘आर्यवीर’’ अनुवादिका : आचार्या शीतल आर्या (पोकार) (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, आर्यवन न्यास, रोजड, गुजरात, आर्यावर्त्त) टंकन प्रस्तुति : ब्रह्मचारी अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ (आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद, तेलंगाणा, आर्यावर्त्त) Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. 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