‘‘अति आण्विक भट्ठी यह शरीर’’ January 13, 2020 By Arun Aryaveer शरीर दस खरब कोशिकाओं से निर्मित अति आण्विक भट्ठी है। इस भट्ठी में दस खरब रासायनिक कारखाने एक-एक पारदर्शी झिल्ली में सतत अविश्राम कार्यरत हैं। सारा का सारा शरीर एक अति आण्विक भट्ठी विद्युतीय व्यवस्था का खेल है। हर कोषिका की झिल्ली कारखानों का कारखाना है। इस झिल्ली जो कि आयानों को पारदर्शी है के आर-पार विभिन्न दुर्लभ अधातुओं के आयनों की लचीली असंतुलित अवस्था होती है। यह असंतुलन मनुष्य के मन, बुद्धि की स्थितियों के अनुरूप घटता बढ़ता है। इसका बढ़ना जीवन की ओर गति है तथा इसका घटना मृत्यु की ओर गति है। इस अति आण्विक भट्ठी में मूल तत्त्वों का परिवर्तन भी होता है। कोबाल्ट निर्माण का तत्त्व इस सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण है कि इसके असंतुलन से रक्ताणुओं की उम्र कम हो जाती है। इस भट्ठी में इलेक्टॉन् स्तरीय आयन विभिन्न अन्तर्सम्बन्धित खेल खेलते हैं। इलेक्ट्रॉन् से छोटे स्तर धलेक्ट्रॉन या क्वॉर्क स्तरीय खेल इन्सान को मालूम नहीं है। फिर भी इन्सान रक्त संरचना, शुक्राणु-रजाणु संरचना, जीन संरचना, कुछ एन्जाईम संरचना तथा कार्य, आंशिक स्व-स्वास्थ्य संस्थान आदि में कैसे कार्य होता है यह जानता है। इन्सान यह नहीं जानता कि ये कार्य क्यों होते हैं। इन्सान इस चलती मशीन के गुण तथा संरचना का कैसे? क्या? कहाँ? तत्त्व जानता है। पर क्यों तत्त्व से अनजान है। सच्चा खेल क्यों तत्त्व है। आखिर यह आण्विक भट्ठी है क्यों? परिवर्तन प्रबन्धन सर्वाधिक कठिन प्रबन्धन है। अति आण्विक भट्ठी यह शरीर परिवर्तनों का महासागर है। इसमें प्रतिपल असंख्य परिवर्तन होते हैं। ये सारे परिवर्तन प्रवहणशील हैं। काल दृष्टि से एक नदीवत अलौट हैं। शिशु पुनः भ्रूण नहीं हो सकता है। ये परिवर्तन अंश से सर्व होने के साथ-साथ सर्व से अंश भी हैं। चोट दुर्घटना के परिवर्तन अंश से सर्व हैं। परिवर्तन प्रबन्धन में चैतन्य इतना प्रबल है कि इंग्लैण्ड के कारखाना क्षेत्र में धुँए कोयले के प्रभाव से सफेद पक्षी स्याह पक्षी में आण्विक स्तर जीन स्तर पर परिवर्तित हो गया और जीवित है। सर्व से अंश परिवर्तन के कई उदाहरण विश्व में हैं। जहाँ अदम्य संकल्प शक्ति से भीषण दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति जिसे डॉक्टरों ने दौड़ने के नाकाबिल घोषित किया था विश्व चैम्पियन धावक बना तथा कई व्यक्तियों ने कैंसरों, बीमारियों को सहजतः मात दी। स्पष्ट है परिवर्तनों में अपरिवर्तनीय महत्त्वपूर्ण है। शरीर में चार मूल शक्तियाँ हैं। ये हैं चुम्बक, विद्युत्, प्रकाश एवं गुरुत्व। गुरुत्व शक्ति सबसे सूक्ष्म है। इसके काल्पनिक कणों का नाम ग्रेविटॉन है। प्रकाश के न्यूनतम कणों का नाम फोटान है। फोटान नापा नहीं जा सका है पर अस्तित्वित है। इन चार शक्तियों में एक एकक शक्ति हैं। चारों शक्तियाँ एकक शक्ति के प्रभाव से एक प्राकृतिक संतुलन में रहती हैं। यह अद्भुत् सत्य है कि प्रकाश के आधार में फोटानों के स्फुरण के मध्य के अन्तराल और फोटान अन्तराल में एक शक्ति सम रहती है तथा प्रकाश से सूक्ष्म है। यह शक्ति इंगन ज्ञात है। इसका सम वितान प्रकाश तथा प्रकाश अन्तराल (न प्रकाश) का प्रवाह है। प्रकाश कूप मध्य अन्तराल में इस शक्ति की खोज आवश्यक है। ये चारों संतुलन एकक शक्ति पदार्थ के बने हैं। पदार्थ शक्ति की उपज ये हैं। पदार्थ से परे अपदार्थ है। अपदार्थ पदार्थ संघात अधिकतम शक्ति देता है। अपदार्थ अभौतिकी दुनियाँ इस भौतिकीय दुनियाँ से अलग है। आत्मा का अस्तित्व अभौतिकीय है। तथा यह अभौतिकीय चैतन्यता चतुःशक्ति भौतिकता पर असंतुलन के रूप में अस्तित्वमान् है। अति अल्प करीब करीब १/ळ-१ (एक बटे अनन्त घटा एक) अंश यह अभौतिकीय अस्तित्व समस्त शारीरिक परिवर्तनों का अपरिवर्तनीय नियन्ता है। अति आण्विक का अर्थ है आण्विक से भी सूक्ष्म। सूक्ष्मतम मापे कण क्वार्क में अर्ध चक्रिय गति असंतुलन से उसमें स्फुल्लिंग निकलता है। यह स्फुल्लिंग प्रकाश कणिका है। स्पष्ट है क्वार्क में प्रकाश गति है। तथा अन्य शक्तियाँ भी हैं और ये क्वार्क रूप संतुलन में हैं। सामान्य क्वार्कों में नियमबद्ध सन्तुलन है। पर शरीर क्वार्क निःसन्देह असंतुलित है। ये जैवशक्ति असंतुलित है तभी तो ये अभौतिक चालित पूरे शरीर को विभिन्न तरीकों से संतुलन के विरुद्ध चालित करते हैं। प्रकाश या गुरुत्व या चुम्बकान शक्ति के सम स्तर से उद्भूत शक्ति पहले सम स्तर प्रवहण आधार बनाती है। तथा तनिक कालान्तर में इस पर व्यक्त-अव्यक्त (प्रकाश के सन्दर्भ में क्वांटम सिद्धान्त) तरंगे उत्पन्न होती हैं यह भौतिकीय तथ्य है। अभौतिकीय अस्तित्व में अति अल्प अपदार्थ पर आत्म चैतन्य का स्फुरण अर्थ के सूक्ष्म स्तर पर सम स्तर प्रवहण (चतुः शक्ति साम्य पर असंतुलन) उत्पन्न होता है तथा उससे व्यक्त-अव्यक्त तरंगों के रूप में संवेदन उत्पन्न होते हैं। इसे देव व्यवस्था, आत्मदेव संचालित कहा जा सकता है। देव उपदेव व्यवस्था इस प्रकार है- देव तैंतीस-तैंतीस समूह होते हैं। वाक् दर्शन इसे सशक्त अभिव्यक्त करता है। वाक् के स्तर हैं- अपरा, परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी, अभिव्यक्ता। इतने ही स्तर वाक् देवताओं के हैं। मूल वाक् देवता अपरा स्थल रहते हैं। इन देवताओं को शब्द तथा अक्षरों की थाली में अर्घ्य दिया जाता है और इनसे शब्द तथा अक्षरों की थाली में ही आशीष लिया जाता है। वेद के दिव्य शब्द स-अर्थ विस्तारार्थ इसी अपरा धरातल से आते हैं। तैंतीस देव परा स्थल बीज अव्यक्त रहते हैं। परा स्थल से उपदेव क्षेत्र के बीज भी प्रारम्भ होते हैं। पश्यन्ती स्थल अक्षरों में अर्थ ढलना शुरु होता है। उपदेव क्षेत्र भी स्पष्ट होते हैं। यह अव्यक्त का धूमिल आकार होता है। मध्यमा स्थल प्राण संसर्ग प्रारम्भ होता है। तथा वैखरी स्थल मुख गुह्वर अन्नमय कोष संघात होता है। वाक् का यह अभिव्यक्तारम्भ स्तर है। इसके पश्चात् संघात बाह्य हो जाता है जो अभिव्यक्ता स्तर है। वाक् के मुख्य तैंतीस देव हैं। जिनके मूलाधार स्वर पांच हैं। इन पांच का आधार एक स्वर है। जिसकी संज्ञा विराट् है। अति अल्प अपदार्थ परे आत्म चैतन्य व्यक्त अव्यक्त का आधार अति आत्म विराट है। अन्नमयकोष = प्राणमय कोष = मनोमय कोश = विज्ञानमय कोष = मेधामय कोष = प्रज्ञामय कोष = आनन्दमय कोष देवताओं का क्रम अनुक्रम है। इनमें से देवता गुजरते उन्नत, अवनत, सउन्नत आदि होते हैं। अन्नमय कोष विज्ञान को तैंतीस जीन सीढ़ीयों तक ज्ञात है। प्राणमय कोष क्षेत्र में विज्ञान ओषजन, कार्बन द्विओषिदादि के अति स्थूल क्षेत्र तक सीमित है। धर्म विज्ञान अन्नमय कोष प्राणमय कोष अनुगुणित तैंतीस (फैक्टोरियल तैंतीस) तक पहचानता है। मनोमय, विज्ञानमय, मेधामय, प्रज्ञानमय, आनन्दमय त्रिसप्त (ये त्रिसप्ताः) द्वारा अथर्ववेद मननीय है। अंग = नवद्वार = अष्टचक्र = सप्तऋिषि = पंच कोष = द्वि कोष = हिरण्य कोष = पंचात्म =पंचातिआत्म = त्रिवाक् = ओ३म्। अति आत्म साधना आरोहण तथा अवरोहण शरीर की आण्विक मन्द दहनीत भट्ठी को न्यूनतम सुखम् तक रखने का सहाय है। स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रियपी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752) Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. Required fields are marked *Comment * Name * Email * Website Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment.