प्रजतन्त्र विस्थापना August 6, 2019 By Arun Aryaveer व्यक्तिमद जनता है दशानन। प्रजामत जनता है प्रजानन। रावण तन्त्र कहीं बेहतर है प्रजातन्त्र से। रावण तन्त्र की हत्या की राम ने। प्रजातन्त्र की हत्या तुम करो। प्रज हो तुम! प्रति जन हो तुम! स्व हो तुम। प्रजतन्त्र गढ़ो। प्रतिजन तन्त्र गढ़ो! स्व-तन्त्र गढ़ो। तुम नहीं, न हो सकते प्रजा। तुम नहीं, न हो सकते जन। तुम नहीं, हो सकते लोक। प्रजातन्त्र, जनतन्त्र, लोकतन्त्र दमघोंटू जहर भरे लबादे हैं तुम्हारा दम घोंट रहे! इन्हें उतारो! जला दो सदा के लिए।।1।। स्व से समविधान लिखो कि हर प्रज भी स्व है। प्रजा से कुछ भी प्रारम्भ नहीं हो सकता। प्रजानन कोटि गुना विकृत दशानन है। क्या तुम्हें नहीं दिखते कमाण्डो, हवाई सफर, भोज, महल रहते गोल-मटोल, थुलथुल, चिकने-चुपड़े…सांसद, मन्त्री, प्रधान, याने प्रजानन?।।2।। प्रजातन्त्र की हत्या करते ही प्रजाननों की हत्या हो जाएगी। प्रजातन्त्र का विकल्प है प्रति-जन-तन्त्र या प्रज-तन्त्र या स्व-तन्त्र। न्याय पालिका व्यवस्था प्रजतन्त्र आधारित है, प्रशासन व्यवस्था प्रजतन्त्र आधारित है, स्कूल कालेजों की शिक्षा-आकलन व्यवस्था प्रजतन्त्र आधारित है। ये व्यवस्थाएं प्रजतन्त्र नहीं हैं पर प्रजातन्त्र से बेहतर हैं। दीमक व्यवस्था, मधुमक्खी व्यवस्था, चींटी व्यवस्था आदि सहज प्रजतन्त्र व्यवस्था हैं। इनमें विवेक समाविष्टि प्रजतन्त्र व्यवस्था होगी।।3।। प्रजातन्त्र शासन का विकृततम रूप है। क्योंकि प्रजा से सर्वाधिक हटकर है। इतिहास प्रजातन्त्र ने नहीं प्रजतन्त्र ने लिखा है। ब्रूनो, गैलीलियो, स्पिनोजा ये सभी प्रज थे। गांधी, दयानन्द, मीरा भी प्रज थे। ये उन्नत प्रज थे। ये प्रजा के मतों के आधार पर श्रेष्ठ नहीं थे। श्रेष्ठता के कारण इन्हें मत मिले।।4।। अब एक प्रश्न उठता है कि प्रजातन्त्र की हत्या हो कैसे? यह प्रश्न अति सरल प्रश्न है। उससे भी सरल इसका उत्तर है। प्रजातन्त्र हत्या तो आप सबने कर ही दी है। यह तो धूर्त व्यवस्था है जिसने प्रजातन्त्र के नाम पर व्यवस्था पर कब्जा किया हुआ है। है न आश्चर्य की बात? थोड़ा सा चिन्तन चाहिए। भारत में तथा विश्व के अधिकांश प्रजातन्त्रों में बहुमत आज भी प्रजातन्त्र व्यवस्था के विरोधियों का ही है। मत न देने वाले मत पाकर जीतने वालों के दुगुनों से भी अधिक हैं। लोगों को लालच, भय दिखाकर अपने पक्ष में पचास प्रतिशत मत भी नहीं जुटा सका है। और करीब 48 प्रतिशत से मात्र 20-22 प्रतिशत मत पाने वाली का शासन प्रजातन्त्र की हत्या नहीं तो और क्या है? प्रजातन्त्र की हत्या हो चुकी है। इसे मत मानो बस! यह समाप्त हो गया।।5।। 52 प्रतिशत लोग प्रजातन्त्र के सारे नियमों के जुए उतार फेंकें प्रजातन्त्र हत्या प्रक्रिया पूरी हो गई।।6।। प्रजातन्त्र की हत्यारी ये 20-22 प्रतिशत मत पानेवाली सरकारें भी हैं। इन्हें प्रजातन्त्र का मूल सिद्धान्त प्रजा का प्रजा द्वारा प्रजा के लिए के अनुसार 52 प्रतिशत लोगों को प्रजातन्त्र के खिलाफ दिए मत की इज्जत करनी चाहिए तथा विधायी शक्तियां भी न्यायविदों, प्रशासकों के लिए छोड़ देनी चाहिए जो प्रजातन्त्र हत्या प्रक्रिया जनता ने शुरु की है, जिसका पालन जनता भारत में इकतालिस वर्ष से कर रही है उसका समस्त राजनैतिक पार्टियों को आदर करते स्वयं को नष्ट घोषित कर देना चाहिए।।7।। प्रजातन्त्र का जवाब है प्रजतन्त्र। प्रजतन्त्र ही स्वतन्त्र, स्वाधीन, स्वस्थ, स्वस्ति शब्दों को सार्थक कर सकता है। इसका आधार ”प्रजानन“ के स्थान पर ”स्वानन“ है। प्रजा में अपना चेहरा सटीक सही प्रत्यय है। ”स्व“ में अपना चेहरा सटीक सही प्रत्यय है। ”जो तुम हो वही है दूसरा“ यही प्रजतन्त्र है। ”आत्मा की उपमा से हर व्यवहार“ है प्रजतन्त्र। ”जो समस्त प्राणियों को आत्मवत जानना तथा उनसे आत्मवत व्यवहार तथा इसका उल्लंघन मात्रानुसार अपराध एवं दण्डनीय यह प्रजतन्त्र का संविधान तथा कानून है। सरल एवं सहज कानून जो हर प्रज जानता है। यही प्रतिजन-तन्त्र है। प्रतिजन = प्रज = आदमी।।8।। प्रतिजनतन्त्र व्यवस्था है योग्यता व्यवस्था। एक स्कूल व्यवस्था के समान, जहां शिक्षा ही योग्यता का आधार है तथा डेढ़ हजार विद्यार्थियों को योग्यतानुसार क्रमबद्ध किया जा सकता है। ग्यारहवी का सर्वोच्च अंक प्राप्त व्यक्ति प्रथम उच्च श्रेणी पर तथा पहली का न्यूनतम अंक प्राप्त व्यक्ति सबसे निम्न सीढ़ी पर रहता है। उपरोक्त शिक्षांक योजना एवं अनुभवांक योजना के साम्मिश्र रूप के क्रमों पर हर सामाजिक को बांट देना ही प्रतिजन-तन्त्र है, या प्रजतन्त्र है।।9।। प्रतिजनतन्त्र या प्रजतन्त्र निदान है अशिक्षा का। इसमें शिक्षा द्वार से गुजरे बिना कोई सफल नहीं हो सकता अतः नई पीढ़ी के आते आते हर व्यक्ति शिक्षित होगा ही।।10।। प्रजतन्त्र निदान है विकृत दबाव समूहों का, हडतालो का, मांगों का, बन्दो का, हुडदंगों का, चुनावी धोखों का, स्टंटों का। इसमें निर्णय गुणवता, आवश्यकता, बौद्धिकता पर लिए जाते हैं।।11।। प्रजतन्त्र स्थायी, अस्थायी, व्यक्ति, योग्यता, अनुभव समन्वय है। 58 वर्ष पर सेवा निवृत्ति वह आधार है जो इसके स्वरूप को परिवर्तनीय बनाती है।।12।। प्रजतन्त्र में आधार प्रत्यय प्रज = व्यक्ति है। जिसमें थोड़े प्रयास से बड़ी उन्नति व्यक्ति स्वयं प्राप्त कर सकता है। प्रजातन्त्र में आधार प्रत्यय औसत प्रजा है जिसमें उन्नति अवनति में वर्षों तक कोई अन्तर भी पता नहीं चलता।।13।। प्रजातन्त्र हत्या की अपेक्षाकृत छोटी प्रक्रियाओं के रूप में हर व्यक्ति को प्रजाननों का सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए। व्यक्तिगत क्षेत्र में न तो उनकी सभाओं में जाना चाहिए न रेडियो, टी.वी. पर उनके भाषण सुनने चाहिएं, न उनके थोबड़े देखने चाहिएं। समाचार पत्रों में उनके समाचार उनके बारे में छपी खबरे भी नहीं पढ़नी चाहएं।।14।। सारे समारोह का जिसमें ये प्रजानन, चमक दमक धारी बुलाए जाते हैं, उनका तथा ऐेसे गुलाम समारोह आयोजकों का भी बहिष्कार करना चाहिए।।15।। चरित्र, शिक्षा तथा अनुभव के जिस स्तर की इन प्रजाननों, फिल्मी सितारों, खेल सितारों की वास्तविक योग्यता है उस स्तर तक उन्हें जनता बौना कर दे। इन बौने मसीहों को जो औसत समाज से भी कम स्तरीय हैं, समाज गंदला करने का हक नहीं है। इनसे इनके ऐसे सारे हक छीन लेने चाहिएं।।16।। भारत के पचास लाख से अधिक मन्दिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे आदि है। इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक के द्वार सप्ताह में एक बार खुलते हैं। यह राष्ट्र भवनसम्पदा का घोर अपमान है। इन सब भवनों को कानूनन निवास विद्यालयों में बदल देना चाहिए।।17।। भारत में कला-महाविद्यालयों तथा वहां लेक्चरारों की भी भीड़ है। यह सारी भीड़ नेतावत मुफ्तखोर हैं। इसका प्रमाण हर शहर के अमहाविद्यालयीन वे छात्र हैं जिन्होनें स्नातकोत्तर परीक्षाएं कला क्षेत्र की सहजतः उत्तीर्ण की हैं। अतः ये निरर्थ महाविद्यालय भी बन्द करके निवास विद्यालयों में बदल दिए जाने चाहिए। यहां से हमें पढ़ाने वालों की भी योग्य भीड़ मिल जाएगी।।18।। इन निवास विद्यालयों में हर विद्यार्थी को समान भोजन, वस्त्र, शिक्षा, पुस्तकें, शयन, रहन-सहन दिया जाएगा। तथा हर विद्यार्थी अभिभावक के पिता से उसकी आय का एक निश्चित प्रतिशत लिया जाएगा।।119।। विद्यार्थी जीवन में किसी भी विद्यार्थी को उसके गृह से कोई सुविधा नहीं मिलेगी।।20।। इन विद्यालयों में शिक्षा मात्र ग्यारहवीं तक होगी। उसके पश्चात अंकानुसार आगे की विभिन्न क्षेत्रीय शिक्षा लागू होगी।।21।। प्रजतन्त्र का एक प्रारूप इस प्रकार है- सभापति (सर्वोत्तम गुण कर्म स्वभाव) विद्यार्य सभा धर्मार्य सभा राजार्य सभा महाविद्वानों निर्मित धार्मिक अतिविद्वानों निर्मित प्रशंसनीय विद्वानों निर्मित (तीनों सभाओं की सभासद संख्या न्यूनतम दस दस) चार मुख्य संचालक (सब विद्याओं के पूर्ण विद्वान) मुख्य न्यायाधीष मुख्य सेनापति प्रधान प्रमुख सभासद- चारों वेद, दर्शन शास्त्र, निरुक्त, धर्मशास्त्र, विज्ञानों के विद्वान (एक भी मूर्ख को उपरोक्त में स्थान नहीं होना चाहिए) इस व्यवस्था का आधार सूत्र है एक धार्मिक, ज्ञानी, वेदज्ञ, उत्तम सन्यासी द्वारा दी गई व्यवस्था सहस्रों, लाखों, करोड़ों, अरबों अज्ञानियों से मिलकर की गई व्यवस्था से बेहतर होती है। प्रजातन्त्र व्यवस्था उपरोक्त व्यवस्था की उलट ही हो सकती है इसलिए घटिया है, इसलिए अयोग्य है।।22।। ”प्रजातन्त्र हत्या की दस्तावेज“ लिखने का उद्देश्य प्रजातन्त्र को प्रतिजनतन्त्र या प्रजतन्त्र द्वारा प्रतिस्थापित करना है। हर उस व्यक्ति से जो प्रज है, स्वयं है, यह अनुरोध है कि वह अपनी अपनी प्रजता के लिए संघर्ष करे तथा प्रजातन्त्र समर्थित प्रजानन व्यवस्था समेत प्रजातन्त्र को समाप्त करने का प्रयास करे।।23।। मैं प्रजातन्त्र हत्या के कुछ बीज इस दस्तावेज के माध्यम से बो रहा हूं। इन बीजों का विकास जनता ही करेगी जो स्वतन्त्र होना चाहती है, स्व-आधीन होना चाहती है, स्व-स्थ होना चाहती है, स्वस्ति होना चाहती है। यह न तो प्रजा-तन्त्र हो सकती है, न प्रजा-आधीन, न प्रजा-स्थ, न प्रजाऽ स्ति ये सारे प्रत्यय असत्य ही नहीं घोर थोथे, घोर झूठ हैं।।24।। यह दस्तावेज भारी मूल्य रखती है। यदि आप इसके कुछ या अधिक या पूर्ण विचारों से सहमत हैं तो उनका आप प्रकाशन द्वारा अभिव्यक्ति द्वारा अपने स्तर पर प्रसार कीजिए। प्रजातन्त्र हत्या नियत है आप केवल चलना शुरु तो कीजिए।।25।। उपरोक्त दस्तावेज से स्पष्ट है कि प्रजातन्त्र हत्या होगी ही। हजारों व्यक्तियों से मैंने चर्चा की सभी प्रजातन्त्र हत्या पर सहमत हैं पर वे एक प्रश्न पर अटक जाते हैं कि प्रजातन्त्र के बाद या इसका विकल्प क्या होगा? प्रजातन्त्र के कई विकल्प हैं जो अपेक्षाकृत अच्छे हैं.. (1) प्रजातन्त्र सबसे घटिया व्यवस्था है, अतः विधायी व्यवस्था रहित प्रशासन भी इससे बेहतर हैं। उद्देशिका छोड़ सारा संविधान नष्ट कर दिया जाए और प्रजानन व्यवस्था समाप्त कर दी जाए। प्रशासन एवं न्याय व्यवस्था मात्र रहे तो कोई त्रुटि नहीं है। यह व्यवस्था आदर्श नहीं है, पर प्रजातन्त्र से बेहतर है। (2) हर क्षेत्र में सर्वोच्च पदों पर आसीन पांच सौ या नियत संख्या के लोग माह में दो दिवस संसद में बैठकर विधायी नीतियां 1) कुछ शत प्रतिशत बहुमत से, 2) कुछ पचहत्तर प्रतिशत बहुमत से, 3) कुछ छियासठ प्रतिशत बहुमत से तथा 4) कुछ पचास प्रतिशत बहुमत से तय करेेेंगे। इन सबकी कार्य उम्र 58 वर्ष ही होगी। एक के 58 वर्ष का होने पर अन्य पदासीन अस्थायी विधायी वर्ग में आ जाएगा। वर्ष दर वर्ष, माह दर माह, कभी दिवस दर दिवस परिवर्तनीय यह व्यवस्था सर्वोच्च योग्यों की व्यवस्था होगी। सारे राजनीतिक लाभ पद, राजनैतिक चुनाव टंटे, राजनैतिक दल समाप्त रहेंगे। दूरदर्शन, रेडियो पर ”संसद ने यह विधायी नीतियां दी“ इस रूप में समाचार दिए जाएंगे। इस व्यवस्था में प्रारम्भिक ग्यारह वर्षीय शिक्षा हर स्थिति निवासीय ही होगी। इसमें समान वस्त्र, समान भोज, समान रहन सहन होगा तथा, लोगों को फीस के रूप में आय का एक निर्धारित प्रतिशत देना होगा। उपरोक्त व्यवस्था में अनुभव एवं शिक्षा के अंक होंगे। मात्र अनुभव या मात्र शिक्षा के अंक नगण्य गिने जाएंगे। अनुभव शिक्षा के अंको का निर्धारण कठिन अवश्य है पर असम्भव नहीं। पदानुसार अनुभव अंको का विभाजन होगा।।26।। इस प्रारूप में अनूभव शिक्षा के न्यूनतम अंक चुनाव पात्रता के लिए आवश्यक होंगे। कोई राजनैतिक दल नहीं होंगे। ”चित्रों“ के आधार पर व्यक्ति चुनाव लड़ेंगे। चुनाव प्रचार अवैध होगा। समाचार पत्रों में उम्मीदवार मात्र स्वयं के बारे में प्रकाशित करा सकते हैं। इस प्रकार सांसद चुने जाएंगे। सांसद ही राज्य एवं केन्द्र विधायी प्रतिनिधि हांेगे। सरकार नहीं गिरेगी। प्रस्ताव 75 प्रतिशत या 66 प्रतिशत या 50 प्रतिशत से अधिक मतों से पास होगें या इनसे कम मतों से निरस्त होगें।।23।। विद्या तथा अनुभव के आधार पर सर्वाधिक अंक प्राप्त व्यक्ति मात्र 58 वर्ष तक राष्ट्र के प्रशासन का प्रमुख होगा। वह अन्य 524 योग्यतम व्यक्तियों के 50 प्रतिशत बहुमत के आधार पर नीतियां तय करेगा। नीति सम्बन्धी प्रस्ताव मात्र प्रमुख प्रशासक ही रख सकेगा।।27।। ये प्रशासन के कुछ प्रारूप हैं। अन्य भी कई प्रारूप हो सकते हैं, जिनमें ब्रह्म के गुणों के अनुरूप कार्यों के मापन द्वारा व्यक्तियों को अंक दिए जाएं। या समस्त धर्मों में निष्णान्तता एवं आचरण आधारित मापन पर आधारित आदि। जैसा कि सिद्ध है प्रजातन्त्र निम्नतम प्रजा उपयोगी सिद्धान्त है, अतः हर व्यवस्था इससे बेहतर ही होगी। मूल आवश्यकता तो प्रजातन्त्र हत्या की है, जिसमें (अ) नेता वर्ग जो दशानन से महाघातक प्रजानन है। (ब) निरुद्देश्य भटकता निठल्ला वर्ग… फिल्म-स्टार, ख्ेाल-स्टार, गिनीज बुक आफ रिकार्ड के अधिकांश रिकार्डधारियों की भी हत्या हो सके। (स) चुनाव भोंपू बन्द हो सके। (द) राष्ट्रव्यापी गाली-गलोच समाप्त हो। (ई) लोेग निहित स्वार्थों के लिए समूहित न हों, आदि-आदि भयानक कुप्रभाव खत्म हों।।28।। हिटलर व्यवस्था ”विकृत प्रजतन्त्र“थी। उसमें भी जर्मनी मानव ने अभूतपूर्व उन्नति की थी। जनता दो तिहाई ऋणावस्था से धनात्मक अवस्था तक पहुंची थी। विश्व के किसी सामान्य प्रजातन्त्र ने इतनी उन्नति नहीं की है। अधिकांश प्रजातन्त्र आजादी पश्चात् वर्ष दो वर्ष के कुल आय जितने ऋणांे में डूबे हैं निर्धन राष्ट्रों के शोषक राष्ट्रों की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं है। स्वस्थ ”प्रजतन्त्र“ही विश्व मानव उन्नति का एकमात्र आधार है। विश्व इतिहास गवाह है कि स्व-यम्, स्व-तन्त्र, स्व- आधीन, स्व-अस्ति, स्व-स्थ व्यक्ति ही महापुरुष हुए हैं। जो भी ”स्व“से जुडा नहींे हैं वह इतिहास रचने के, नेता होने के अयोग्य है। प्रतिजन-तन्त्र या प्रज-तन्त्र या स्व-तन्त्र व्यवस्था स्व आधारित है। इसमें कई-कई इतिहास रचने की सम्भावनाएं हैं। प्रजातन्त्र इस अर्थ में बंजर है। इसके करीब-करीब सारे नेता इतिहास रचने के अयोग्य, प्रजामतों के द्वारा हत या छोटे किए गए होते हैं। प्रजतन्त्र में महापुरुष पूर्ण प्रजा से उच्च रहते अपने जीवन से उच्चता की ओर प्रेरित करते हैं। जनता स्वेच्छया उच्चता की ओर प्रेरित होती है। प्रजातन्त्र में व्यवस्था उलटी है। प्रजानन योग्यों को निम्नता देता है तथा अयोग्योें का मत बटोरने निम्न का समर्थन करता है। ”प्रजातन्त्र हत्या की दस्तावेज“लिखने का उद्देश्य प्रजातन्त्र को प्रतिजनतन्त्र या प्रजतन्त्र या स्वतन्त्र द्वारा प्रतिस्थापित करना है। हर उस व्यक्ति से जो ”प्रज“है ”स्वयं“है यह अनुरोध है कि वह अपनी-अपनी प्रजता के लिए संघर्ष करे तथा प्रजातन्त्र समर्थित प्रजानन व्यवस्था समेत प्रजातन्त्र को समाप्त करने का प्रयास करें।।29।। स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752) Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. Required fields are marked *Comment * Name * Email * Website Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment.