०७४ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (२५) January 10, 2020 By Arun Aryaveer Download चतुर्थ समुल्लासःभाग (२५) पतितोऽपि द्विजः श्रेष्ठो न च शूद्रो जितेन्द्रियः। निर्दुग्धा चापि गौः पूज्या न च दुग्धवती खरी।। १।। अश्वालम्भं गवालम्भं सन्यासं पलपैत्रिकम्। देवराच्च सुतोत्पत्तिं कलौ प९च विवर्जयेत्।।२।। नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ। प९चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते।।३।। दोहा मन गढ़न्त पाराशरी झूठ पाप की खान। पाराशर के नाम से, किया ग्रन्थ निर्मान।। चौपाई द्विज हो चाहे दुष्ट कुकर्मी, फिर भी वह धर्मी का धर्मी। शूद्र करे पुन उत्तम कारज, फिर भी नीचा पतित अनारज। क्या अन्याय घोर पखपाता, कैसी मूरखता की बाता। जिमि ग्वाले पालत नित गैय्या, बिना दूध वा दूध की दैय्या। तिमि कुम्हार गधही को पाले, निज संतति वत उसे सम्हाले। गाय गधी को विषम निदर्शन, यहां न इसका उचित प्रदर्शन। भिन्न जाति के दोनों जन्तु, विप्र शूद्र हैं मनुष परन्तु। दोहा मान लिहो या श्लोक में, एक देश दृष्टान्त। फिर भी आशय झूँठ है, किमि माने सम्भ्रान्त।। चौपाई घोड़े अरु गैय्या को मारा, उनका माँस हवन में डारा। नहीं वेद में यदि विधाना, तो पुन वृथा निषेध कराना। यदि निषेध है कलियुग माँहीं, सतयुग में पुन क्यों विधि नाँहीं। तांते यह दुष्कर्म असम्भव, नहीं किसी युग में भी संभव। कलि में खाना माँस बुराई, युग युग बुरा न तनिक भलाई। वेद विदित जब अहै नियोगा, उचित नार देवर संभोगा। पुन जड़ मूरख अज्ञ समाना, तर्क कुतर्क करें क्यों नाना। प्रश्न पति परदेश गये ते नारी, यदि नियोग कर ले बेचारी। अकस्मात पति घर आ जावे, तो नारी किसकी कहलावे। पति स्वामी है अन्य न कोई, जिस ब्याहा तिस राखे सोई। मान लिहो यह उत्तर साँचा, वेद विदित नहीं मिथ्या काँचा। पर पाराशरि क्यों नहीं बोले, क्यों नहीं सत्य तुला सों तोले। पांचहु आपतकाल बताए, इन में नार नियोग कराए। क्या पांचहु हैं आपत्काला, पाराशरि का वचन निराला। साँतें ऐसे श्लोक न माने, मनगढ़न्त इनको सब जाने। प्रश्न पाराशर मुनि के वचन, क्यों नहीं तुम्हें प्रमान। ऋषि मुनियों का अज तक, करे जगत सन्मान।। उत्तर वेद विरुद्ध माने नहीं, वचन किसी का होय। वेदों के अनुकूल जो, सत्य प्रमाणें सोय। चौपाई तुमने यह जो श्लोक सुनाए, पाराशर के नहीं बनाए। ब्रह्मादिक लिखने की रीति, ग्रंथ कार लोगों की नीति। ‘शिव उवाच’ अथ नारद बोले, नाम देख फँसते नर भोले। यह पुस्तक तब आदर पाएं, ग्रंथ कार जन मौज उड़ाएं। यह दम्भी लेखक पाखण्डी, अर्थ अनर्थ लिखें उद्दण्डी। कुछ प्रक्षित श्लोक अतिरेका, माननीय केवल मनु एका। अन्य ग्रन्थ जंजाल रचाए, भोले जन हित जाल बिछाये। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)