०६८ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (१९) January 10, 2020 By Arun Aryaveer Download चतुर्थ समुल्लासःभाग (१९) मूर्खं लक्षण अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः। अर्थांश्चाऽकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः।। १ ।। अनाहूतः प्रविशति ह्यपृष्टो बहु भाषते। अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः।। २।। – म० भारत उद्योग पर्व, विदुर प्रजागार अ० २३ शास्त्र पढ़ा अरु सुना न कोई, निपट निरक्षर मूरख सोई। गाँठ नहीं इक दाम छदामा, मन में चाहे श्रीपति धामा। मन के लड्डू बैठा खावे, सो मूरख अंजान कहावे। बिना कर्मं राखे फल आशा, उस मूरख की आश दुराशा। बिन पूछे बोले अभिमानी, बिन बुलाय आवे अज्ञानी। ऐसे नर को मूरख कहिये, भला चहो तो दूरहि रहिये। जँह ऐसे जड़ शिक्षादायक, गर्दभ शंख ढपोल विनायक। राजत वहाँ अविद्या रानी, फूट कलह बढ़ती मनमानी। घर घर होय पाप अरु क्लेशा, अवनी गर्त गिरे वह देशा। विद्यार्थी के दोष आलस्यं मद आलस्यं मदमोहौ च चापलं गोष्ठिरेव च। स्वब्धता चाभिमानित्वं तथाऽत्यागित्वमेव च। एते वै सप्त दोषाः स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः।। १।। सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्। सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत्सुखम्।।२।। – म० भा० विदुर प्रजागर अ० ३९ तन में मन में जड़ता आलस, मद सेवी विषयों का लालस। चपल व्यर्थ बातें बतरावे, रुक रुक कर जो पढ़े पढ़ावे। अत्यागी अभिमानी छातर, सो छातर नहीं विद्या पातर। सप्त दोष जानहु अति भारी, इनते रहित पठन अधिकारी। सुख लिप्सु विद्या नहीं पावे, सुख विद्यारथि नहीं उठावे। विद्यार्थी के गुण सत्ये रतानां सततं दान्तानामूर्ध्वरेतसाम्। ब्रह्मचर्यं दहेद्राजन् सर्वपापान्युपासितम्।। सदा सत्य में रखे प्रवृति, झूठ पाप सों हो निवृत्ति। इन्द्रियजित वश राखे मन को, त्याग करे चित से विषयन को। अधो मार्ग नहीं बीज गिरावे, वीरज रेतस ऊर्ध्वं बचावे। उनका ब्रह्मचर्य है साँचा, उनका चित विद्या में राँचा। यत्न करे अध्यापक सज्जन, योग्य श्रेष्ठ सच्चे विद्वज्जन। शिष्य होंय उनके सतवादी, व्यर्थ बकें नहीं हों बकवादी। सत्य करें सत मानें मानी, सभ्य शील युत निर अभिमानी। इन्द्रिय जित पूरन गुणवन्ता, तन सों मन सों हों बलवन्ता। हो वेदज्ञ रु शास्त्र प्रवीना, आर्य रीति से जिनका जीना। छात्र बनायें जीवन सुन्दर, विद्या पारग ज्ञान समुन्दर। शान्त जितेन्द्रिय शील स्वभावा, उद्यमशील श्रमी सद्भावा। ऐसा करहिं नित्य पुरुषारथ, जाते विद्या होय सकारथ। धर्म आयु विद्या के पूरे, गुण पूरे नहीं रहें अधूरे। ब्राह्मण वर्ण छात्र के धर्मा, अब सुनिये वैश्यन के कर्मा। ब्रह्मचर्य सन पढ़े पढाए, तरुण होय जब ब्याह कराए। सब देशों की भाषा जाने, मनो भाव उनके पहचाने। नानाविध व्यापारिक रीति, चाल ढाल अर रीति नीति। क्रय विक्रय सों लाभ उठाना, दीप दीपान्तर आना जाना। पशु पालन खेती की उन्नति, धन सम्पति की सदा समुन्नति। विद्या धर्म हेतु व्यय करना, सत्य कथन अनृत सों डरना। निश्छल शुद्ध करे व्यापारा, झूठ कपट सों रहना न्यारा। वस्त का संग्रह और रक्षण, यह सब वैश्यों के हैं लक्षण। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)