०६६ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (१७) January 10, 2020 By Arun Aryaveer Download चतुर्थ समुल्लासःभाग (१७) दृढ़कारी मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन्। अहिंस्त्रो दमदानाभ्यां जयेत्स्वर्गं तथाव्रतः।।१।। वाच्यर्थानियताः सर्वेवाड्मूला वाग्विनिःसृताः। तां तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः।।२।। आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः। आचाराद्धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम्।। ३ ।। – मनु. ४ । २४६ । १५६ चौपाई दृढ़ निश्चय वत मृदुल सुभाउ, इन्द्रिय जित निज मन को राऊ। हिंसक सों नहीं राखे प्रीति, दानी कबहुँ न त्यागे नीति। यह नर अटल सुःख को पावहिं, दुःख दरिद्र तिन निकट न छावहिं। नियत अर्थ वाणी को सारा, वाणी मूल सकल व्यवहारा। करहि जो उस वाणी की चोरी, मिथ्या भाषण करत वहोरी। महां घोर पतितन को राजा, सो डूबे सह सकल समाजा। ताँते चौर कर्म नहीं करिये, धर्म नाव चढ़ भव जल तरिये। सदाचार इक आयु बढ़ावे, मन वा९िछत संतति को पावे। अक्षय धन संपति को लाभा, निर्मल बुद्धि मस्तक आभा। सदाचार सो नशत बुराई, सच्चरित्र की महिमा गाई। दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः। दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ।। – मनु. ४ । १५७ दुराचार निन्दा का कारण, घृणा करे सब जन साधारण। संतत रोगी बहु दुख भागी, दुर्व्यसनों की जिहिं लत लागी। छोटी आयु में मर जाए, दुराचार, सर्वस्व नशाए। यद्यत्परवशं कर्म तत्तद्यत्रेन वर्जयेत्। यद्यदात्मवशं तु स्यात् तत्तत्सेवेत यंततः।।१।। सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्। एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।।२।। – मनु. ४ । १५९६-१० चौपाई पराधीन कर्मों को त्यागो, निज वश कर्मों से अनुरागो। पराधीनता अति दुखदायी, है स्वाधीनता सुख कर भाई। यह दोनों सुख दुख के लक्षण, जानत हैं धीमान विचक्षण। याको भाव समझ मन माँही, यह लक्षण कोउ व्यापक नाहीं। परवश रहें सदा नर नारी, इत परवशता है सुखकारी। नारी गृह के काज संवारे, पुरुष जीविका लाए प्यारे। वह लावें वह अन्न पकावें, अपना अपना काज निभावें। मात पिता के पुत्र अधीना, बिगड़ जाँय जो हों स्वाधीना। बाला बालक गुरुकुलवासी, गुरु वश हों विद्या के राशी। कन्याओं को नारी पढ़ावें, नाना विद्या शील सिखावे। सदा सिखाये पति की प्रीति, याही सद्गृहस्थ की रीति। पुरुष पढ़ायें बालक ऐसे, सुख मय जीवन बीतें जैसे। पुरुष देव हैं देवी नारी, सच्चरित्र मत हो व्यभिचारी। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)