०६२ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (१३) January 10, 2020 By Arun Aryaveer Download चतुर्थ समुल्लासःभाग (१३) दोहा आहुति देकर अन्न के, चहुं दिश राखे भाग। आगन्तुकहिं खिलाये दे, अथवा डारहि आग।। चौपाई ता पाछे सब अन्न सलोने, दाल शाक आदिक रख दोने। चौके मँह भूमि पर धरिये, विधि सों शास्त्र रीति अनुसरिये। ओं आनुगायेन्द्राय नमः। सानुगाय यमाय नमः। सानुगाय वरुणाय नमः। सानुगाय सोमाय नमः। मरुद्भ्यो नमः। अद्भ्यो नमः। वनस्पतिभ्यो नमः। श्रियै नमः। भद्रकाल्यै नमः। ब्रह्मपतयेनमः। वास्तुपतये नमः। विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः। नक्त९चारिभ्यो भूतेभ्यो नमः। दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम्। वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद् भुवि।। – मनु. ३ । १२ चौपाई क्रिमिभ्यो नम इत्यादि उचरिये, अन्न सलोने भू पर धरिये। रोगी पतित काक ओर श्वाना, लवण अन्न इन कंह कर दाना। नमः शब्द का अन्न प्रयोजन, काकादिक को दइये भोजन। यह विध मानव शास्त्र बखानी, प्राणिमात्र के हित कल्यानी। जिस चौके में पकता भोजन, वायु शुद्धि का तहां प्रयोजन। ताँते दइये अवस आहूति, जा ते होय न रोग प्रसूति। जीव जन्तु मरते अनजाने, जब कोई लगे रसोई बनाने। ताँते उनकी करो भलाई, हत्या दोष न लागे भाई। पंचम यज्ञ अतिथि की सेवा, साक्षात अभ्यागत देवा। तिथि समय कोउ नियत न जाका, अतिथि नाम शास्त्र कहें ताँका। अभ्यागत् योगी संन्यासी, उपदेशक विद्या के रासी। ठौर ठौर उपदेश सुनावें, शान्त करे मन ताप मिटावें। ऐसे जनजिस गृह में आवें, वे गृहस्थ मानहु तर जावें। अभ्यागत को आदर कीजे, अर्घ्य पाद्य आसन पुन दीजे। स्वादु रसीले नाना व्य९जन, तनु पुष्टि कर अरु मन र९जन। तृप्त करें आगत अभ्यागत, तन मन धन से कीजे स्वागत। बात चीत पुन करिये नाना, जासों बड़े गृही को ज्ञान। देस देस आचार ब्यौहारा, उनके रहन सहन परकारा। सब जाने अरु लाभ उठावें, सत्संगति सों ज्ञान बढ़ावें। सद्गृहस्थ अरु नृप अभ्यागत, दोउ पाहुने हैं गृह आगत। पाषण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालवृत्तिकान् शठान्। हैतुकान् बकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्।। – मनु. ४ । ३० कुत्सित कर्मी और पाखण्डी, वेद विरोधी शठ उद्दण्डी। जिनके मन को वृत्ति बिलारी, मीठी वाणी कपट संवारी। बक वृत्ति मूरख अभिमानी, ज्ञानी बनें स्वयं अज्ञानी। जिमि वैरागी जोगी खाखी, जटा बांध मुनि मूरत राखी। निरे निरक्षर लम्पट धूरत, वेद विरोधी छल की मूरत। जो इनका कीजे सत्कारा, तो फैलेगा भ्रष्टाचारा। स्वयं गिरें अरु लोक गिरावें, दुःख सागर में देश डुबायें। ऐसे नर को नहीं आदरिये, अपने गृह सों बाहर करिये। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)