०६० स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (११) January 4, 2020 By Arun Aryaveer Download चतुर्थ समुल्लासःभाग ( ११ ) ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा। नृयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत् ।। १ ।। दोहा देव यज्ञ ऋषि यज्ञ दो, कीजे सायं प्रात। जो जीवन में सुख चहो, तजहु न इनको तात। चौपाई वेद पाठ अरु सन्ध्योपासन, योगाभ्यास बैठ शुभ आसन। विद्वत्संग शुद्धि अरु दाना, यह दोउ यज्ञ करत कल्याना। अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञश्च तर्प्पणम्। होमो देवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्।। २ ।। – मनु० ३ । ७० स्वाध्यायेनार्चयेतर्षीन् होमैर्देवान् यथाविधि। पितृन् श्राद्धैश्च नृनत्रैर्भूतानि बलिकर्मणा।। ३ ।। – मनु० ३ । ८१ सायंसायं र्गृहपतिर्नो अग्निः प्रातः प्रातः सौमनस्य दाता।।१।। प्रातः प्रातगृहपतिर्नो अग्निः सायंसायं सौमनस्य दाता।।२।। – अथर्व० १९ । ७ ं ३-४ तस्मादहोरात्रस्य संयोगे ब्राह्मणः सन्ध्यामुपासीत। उद्यन्तमस्तं यान्तमादित्यमभिध्यायन्।। ३ ।। -षड्विंशब्राह्मण प्र० ४ । खं० ५ न तिष्ठति तु यः पूर्वों नोपास्ते यस्तु पश्चिमाम्। स साधुभिर्बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः।।४।। – मनु० २ । १०३ प्रात हवन दिन भर हरषावन, रखे रात्रि तक पौनहिं पावन। बल बुद्धि अरु स्वास्थ्य बढ़ाए, तांते प्रति दिन हवन कराए। जब होवे दिन रात की संधि, हवन करे नाशहि दुर्गन्धि। कर प्रभु की भक्ति अरु ध्याना, जो चाहो प्राणी कल्याना। जो नर दोऊ कर्म नहीं धारहिं, द्विज गण वाको बहिर निकारहिं। प्रश्न (दोहा) संध्योपासन उचित है, नित करना त्रैकाल। दोऊ काल कैसे कहें, छोड़ सनातन चाल।। उत्तर साँझ प्रात संधिके काला, पुन संध्या किस विध त्रैकाला। मिलते अंधकार अरु जयोति, जौन समय वह संधि होती। मध्य दिवस जो संध्या करिये, मध्य रात्रि पुन काहे बिसरिये। प्रहर प्रहर अरु घड़ी घड़ी सों, संध्या बांधी एक लड़ी सों। कौन समय जब संध्या नाँही, कछु सोचें अपने मन माँही। वेद शास्त्र बहु देखे भाले, नहीं प्रमाण संध्या त्रैकाले। दोहा भूत भविष्यत वर्तमान, इनको कहें त्रिकाल। काल भेद नहीं संधि से, कहें शास्त्र गोपाल।। चौपाई तृतिये पितृ यज्ञ बखाने, मात पिता गुरु जन सन्मानें। पितृ यज्ञ दोउ विध मन भावन, गुरु जन तर्पण श्राद्ध जिमावन। ‘श्रत्’ है ‘‘सत्य’’ अर्थ प्रतिपादक, सत्य क्रिया श्रद्धा संपादक। श्रद्धा सों जो कीजे कर्मा, सोऊ श्राद्ध जानहु निज धर्मा। मात पिता का करिये तर्पण, तन मन धन सब उनके अर्पण। तर्पण श्राद्ध जियत का कीजे, मृतक न खावे पीवे रीझे। ओं ब्रह्मदयो देवास्तृप्यन्ताम्। ब्रह्मादिदेवपत्न्यस्तृप्यन्ताम्। ब्रह्मादिदेवसुतास्तृप्यन्ताम्। ब्रह्मादिदेवगणास्तृप्यन्ताम्। इति देवतर्पणम्। दोहा ‘‘विद्वासो हि देवाः’’ यह, शतपथ ब्राह्मण का वचन। देव सभी विद्वान हैं, सेवा कीजे कर लगन। चौपाई साङगोपाङग वेद जो जानें, वाकी संज्ञा ब्रह्मा मानें। ब्रह्मा से घट कर हें देवा, सब देवन की कीजे सेवा। देवी कहिये विदुषी नारी, विद्या भूषण सहित सवारी। उनके योग्य शिष्य अरु जाये, यह सब देव गणन में आये। जिनका कीजे श्राद्ध से तर्पण, करिये श्रद्धा सहित समर्पण। ऋषि तर्पण ओं मरीच्यादय ऋषयस्तृप्यन्ताम्। मरीच्याद्यृषिपत्न्यस्तृप्यन्ताम्। मरीच्याद्यृषिसुतास्तृप्यन्ताम्। मरीच्याद्यृषिगणास्तृप्यन्ताम्।। इति ऋषितर्पणम्।। चौपाई जिमि मरीचि ब्रह्मा का पोता, चतुर्वेद वित यज्ञ जुहोता। सत्याचारी विद्यादाता, जग उपकारी वेद विधाता। तिस विध उनकी विदुषी नारी, कन्या जगत पढ़ाने हारी। शिष्य पुत्र अरु सेवक उनके, दृढ़ विश्वासी वैदिक धुन के। उनका पूजन अरु सत्कारा, ऋषि तर्पण यह जाय पुकारा। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)