०५७ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (०८) January 3, 2020 By Arun Aryaveer Download चतुर्थ समुल्लासःभाग (०८) विवाह के लक्षण ब्राह्मो दैवस्तथैवाषैः प्राजापत्यस्तथाऽऽसुरः। गान्धर्वों राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः।। – मनु० ३ । २१ आठ भाँति का होय विवाहू, ब्राह्म दैव और आरष आहू। प्राजापत्य असुर गन्धर्वा, राक्षस अरु पैशाच सगर्वा। ब्राह्म ब्याह है सब सों उत्तम, माननीय अरु पूज्य प्रभूत्तम। ब्रह्मचर्य पूरन विद्वाना, धर्म परायण शील समाना। हो प्रसन्न जो करें विबाहा, ब्राह्म कहावे सुख सन्नाहा। दूजा दैव विवाह कहावे, भूषणयुत कन्या वर पावे। वर से ले कछु कन्या दाना, आर्ष विवाह तीसरा माना। प्राजापत्य पुण्य को मूला, केवल धर्म वृद्धि अनुकूला। वर कन्या दोनों कछु पावें, सो विवाह आसुर कहलावें। नियम रहित बिन समय प्रबन्धा, वर कन्या का हो सम्बन्धा। मन के मिले मिलें जब दोऊ, है गान्धर्व विवाहा सोऊ। झपट कपट बल कर हर लाना, राक्षस ब्याह नीच तर माना। महाभ्रष्ट पैशाच विवाहा, करे सो ेपावे पाप अथाहा। सोती पागल सुरा पिलाई, कन्या को भोगे हरजाई। ब्राह्म ब्याह सर्वोत्तम बोले, प्राजापत अरु दैव मंझोले। गान्धर्व आसुर और आरष, यह तीनों निकृष्ट अनारष। अधम ब्याह राक्षस अति घोरा, महाभ्रष्ट पैशाच अथोरा। वर कन्या निश्चय ठहरावें, ब्याह पूर्व मिलने नहीं पावें। तरुणाई में नर अरु नारी, बसहिं अकेले दूषण भारी। पठन काल जब होवे पूरन, करें प्रबन्ध गुरु सम्पूरन। कन्या चित्र पठे गुरवानी, चरित कथा सब संग सुहानी। वर का गुरु वर चित्र पठावे, वर चरित्र लिख कर बतलावे। दोनों के गुण कर्म सुभावा, मिलें तो करें ब्याह ठहरावा। वर कन्या को चित्र दिखावें, जीवन के इतिहास सुनावें। जब दोनों की अनुमति पाएं, तब विवाह सम्बन्ध कराएं। गुरु सन्मुख यदि ब्याहा चाहें, गुरुकुल में ही ब्याह करावें। अथवा गुरु से छुट्टि पाकर, ब्याह करें कन्या गृह जाकर। वर कन्या जब सन्मुख आवें, दोनों के शास्त्रार्थ करावें। गुप्त प्रश्न यदि हों प्रष्टव्या, उत्तर लिख देना कर्त्तव्या। जब दोनों की दृढ़ हो प्रीति, खान पान करिये भल रीति। उनका करें गुरु जन पालन, पौष्टिक भोजन लाड़न लालन। ब्रह्मचर्य मँह कष्ट उठाए, तप में पच्चिस वर्ष बिताए। अक्खड़ रूखे भये जो अंगा, पुन पनपें पा प्रीति गंगा। चन्द्र कला सम दिन दिन चमके, हष्टपुष्ट तनु जोबन दमके। रजोवती कन्या जब होवे, शुभ पवित्र हो नहावे धोवे। उस दिन मँडप रचे विशाला, बृहद् होम होमे तत्काला। सखा मित्र समधि बुलवावे, सादर प्रीति भोजन खिलावे। उचित पांय जिस दिन ऋतु दाना, उसी दिवस संस्कार कराना। संस्कार विधि के अनुसारा, कीजे सकल क्रिया व्यौहारा। अर्ध रात्रि वा उस से पूरब, कर विवाह वधु गहे अपूरब। वधु ले जाय एकान्तिक वासा, प्रभु ने कीनी पूरन आसा। वीरज व्यर्थ कुथल नहीं वर्षे, स्थापहि नर नारी आकर्षे। उत्तम ब्रह्मचर्य का वीरज, रज सों मिश्रि वधु शरीरज। ताँते हो उत्तम सन्ताना, सबल निरोगी बहु गुण बाना। वीर्य पात का हो जब काला, स्थिर होवें नर युवती बाला। नासा सन्मुख नासा आवे, नयनन सों निज नयन मिलावे। सीधा राखें दोउ सरीरा, मन प्रसन्न तन डिगें न धीरा। नर निज तन को ढीला छोड़े, निज योनि को नार सिकोड़े। ऊपर बीरज करे आकर्षण, गर्भाशय में वीर्य प्रवर्षण। पुन ऐसे कछु समय बिताना, शुद्ध सलिल सों कर असनाना। पढ़ी लिखी जो विदुषी नारी, तुर्त जान ले गर्भ सुधारी। गये मास जाने सब कोई, रजोधम्र उनके नहीं होई। अश्वगंध केसर अरु एला, सालब मिसरी सोंठ नवेला। उष्ण दूध मँह इन्हें मिलावें, भोग बाद दोनों पी जावें। पृथक् पृथक् शय्या पर लेटें, शयन करें पुन बहुरि न भेटें। जब जब चाहें शर्भाधाना, करें शास्त्र विधि एहि समाना। गर्भ स्थिति का निश्चय होवे, बहुर न नारी के संग सोवे। एक वर्ष नहिं करें समागम, ऐसी आज्ञा देवहिं आगम। उनकी उत्तम हो सन्ताना, रोग रहित सुन्दर बलवाना। जो नहीं चले शास्त्र अनुसारा, जीवन भर रोवे दी मारा। वीर्य जाए आयु घट जाए, नित का रोगी औषध खाए। छोड़ें नहीं परस्पर प्रीति, मन से राखें दोनों प्रीति। सपनेहू मँह वीर्य न जावे, ऐसी गति पुरुष अपनावे। नारी करे गर्भ का रक्षण, सुपच स्वाद भोजन कर भक्षण। गर्भज बालक हो बलवाना, रूपवान लावण्य निधाना। दशमें मास जनम को धारे, निज जननी का कष्ट निवारे। चतुरथ मासे सावध रहिये, अधिक ध्यान अष्टम में दइये। रे चन रूखे भोजन भारी, सेवहि गर्भवती मत नारी। गेहूं उड़द दूध घृत शाली, सेवहि नारी बालक बाली। देश काल सेवहि कर युक्ति, पावहिं सभी कष्ट से मुक्ति। गर्भ दशा में हो संस्कारा, करहिं नार नर अधिक विचारा। करहु पुसंवन चौथे मासे, कुत्सित संस्कार सब नासे। अष्टम में सीमन्तोनयना, यजन पाठ करि सुन्दर वैना। जन्म लेय बालक जिस काले, नारी अरु शिशु उभय संभाले। सेवन शुण्ठी पाक करावे, जाके सेवन से बल आवे। कोष्ण सुगन्धित निर्मल नीरा, धोवे नारी निबल सरीरा। सुख जलहिं बालक नहलाये, अंक मांहि उस को पौढ़ाए। ता पाछे कर नाड़ी छेदन, कर डारे नाड़ी का भेदन। कोमल गहे सूत को धागा, बँधे नाभि की जड़ का भागा। अंगुलि चार छोड़ कर डारे, सुख से बालक गोद सम्हारे। ऐसी विधि सों सूत बंधावे, बिंदु रक्त भी निकस न पावे। वह भूमि शोधे पश्चाता, जन्म दिया बालक जँह माता। द्रव्य सुगन्धित होम जलाएं, अणु दुर्गंधित सब जर जाएं। पिता पुत्र को गोद सम्हारे, ‘वेदोसि’ यह वचन उचारे। घृत मधु सानी स्वर्ण सलाई, जिह्वा पर कर ‘ओउम्’ लिखाई। उसी शलाका को चटवावे, माता ले शिशु गोद खेलावे। दूध पिलावे उस को माता, दूध अभावे लावे धाता। स्वस्थ दूध वारी कोऊ नारी, होवे दुग्ध पिलावन हारी। पुन प्रसूतिका जाय वहां पर, निर्मल वायु आय जहां पर। करे होम उत दोनों काला, जिह विधि हो सुख सों प्रतिपाला। मातृ दुग्ध छः दिन शिशु पीवे, पुष्ट भोजन सों माता जीवे। खाए स्वस्थ पदारथ रोचन, करती रहे योनि संकोचन। छठे दिवस पुन बाहर निकसे, रवि को देख कपल जिमि विकसे। बालक के हित राखे धाई, स्वच्छ वस्त्र जो रखे सफ़ाई। वह बालक को दूध पिलावे, पाले पोवे और खिलावे। ध्यान रखे बालक का माता, पुन कुपथ्य होने नहीं पाता। स्तन पर ऐसा लेप लिपावे, पुनः दुग्ध चूना नहीं पावे। नामकरण आदि संस्कारा, ‘संस्कार विधि’ के अनुसारा। यथा काल सब करता जाए, सुखमय सब परिवार बनाए। रजस्वला पुन जब हो वामा, यही रीति कर ले सुख धामा। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)