०५४ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (०५) January 3, 2020 By Arun Aryaveer Download चतुर्थ समुल्लासःभाग (०५) चारों वर्णों के गुण और कर्म अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहश्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्।। १।। – मनु० १ । ८८ शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्मस्वभावजम्।। २ ।। – भ० गी० अ० १८ । ४२ पाठन पठन यजन अरु याजन, दानादान विप्र के भाजन। ब्राह्मण के हैं यह छः कर्मा, पूरन करें विप्र निज धर्मा। बुरा कर्म नहीं मन में लावे, भूल न मन में पाप समावे। इन्द्रिय को अन्याय से वरजे, पाप पंथ सों मन में लरजे। ब्रह्मचारि इन्द्रिय कँह जीते, धर्म काय मंह आयु बीते। शमदम तप तीनहुं को धारे, वह साँचा ब्राह्मण है प्यारे। अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति। विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति।। – मनु० ५ । १०९ जल सों शुद्ध होंय सब अंगा, कूप नहाओ नहाओ गंगा। सत्य वचन से मन हो पावन, सत्य गंग में करले धावन। विद्या तप से आतम शुद्धि, ज्ञान पाय पावन हो बुद्धि। राग द्वेष को मन से तजिये, मिथ्या त्याग सत्य को भजिये। स्तुति निंदा दुखसुख क्षुत् प्यासा, शीत उष्ण की करे न आसा। हर्ष शोक से रहना ऊपर, वही शान्त ब्राह्मण है भू पर। अहंकार नहीं राखे मन में, सरलभाव रहता ब्राह्मण में। ऐसा ब्राह्मण ऋजु स्वभावा, जग में वाका पूर्ण प्रभावा। साङगोपाङग वेद को जाने, कर विवेक सत को पहचाने। जड़ को जड़ चेतन को चेतन, ऐसा ज्ञान युक्त हो ब्राह्मण। ज्ञानी विज्ञानी सब जाने, जड़ चेतन सब जग पहचाने। पृथिवी से ईश्वर पर्यन्ता, जग में भरे पदार्थ अनन्ता। उनका करना सत उपयोगा, जग सुख पावे कर उपभोगा। ईश्वर वेद मुक्ति सब माने, आवागवन जीव सत जाने। विद्या धर्म ओर सत्संगा, मातृ पितृ सेवा में रंगा। करता रहे अतिथि की सेवा, मात पिता गुरु माने देवा। यह चौदह ब्राह्मण के कर्मा, उत्तम वर्ण विप्र सद्धर्मा। क्षत्रिय के लक्षण प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः।। १ ।। – मनु. १ । ८९ शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।। २ ।। – भ० गी० अ० १८। ४३ न्यायावान परजा रखवारा, सज्जन का करता सत्कारा। दुष्टों के सिर राखे डंडा, उनका चूरन करे घमंडा। सत्पात्रन में देवे दाना, जग में विद्या धर्म बढ़ाना। याग यजन वेदों का पढ़ना, लाखों शत्रु अकेले लड़ना। इन्द्रियजित बलवान शरीरा, शोर्यवान तेजस्वी वीरा। कार्य कुशल निर्भय रणधीरा, सज्जन सन्मुख ठाड़े सीरा। रण में कबहुं पीठ नहीं देवे, ज्यों त्यों हाथ विजय को लेवे। भागे रिपु को देवे धोखा, दाँव पंच में होय अनोखा। अवसर देख शत्रु को मारे, उचित गति रण मौहि विचारे। दानशीलता ईश्वर भावा, कभी न त्यागे न्याय स्वभावा। यथा योग्य परजा से बरते, कभी अन्याय करे नहीं कर ते। मन मंह पक्षपात नहीं राखे, सब सों बात न्याय की भाखे। कर विचार पुन देवे दाना, दान सहित आदर सन्माना। करे प्रतिज्ञा अपनी पूरी, पाये प्रशंसा भूरी भूरी। यह एकादश क्षत्रिय लक्षण, क्षत्रिय धर्म देश का रक्षण। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)