०४६ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (२४) December 29, 2019 By Arun Aryaveer Download तृतीय समुल्लास भाग (२४) प्रश्न क्या इन मंह कुछ भी सच नाहीं, केवल झूठ भरा इन माँही। मानत नाहीं आप पुराना, सब इतिहास और उपखाना। यह पुराण सब कथा सुनावें, पुरखों का वृत्तान्त बतावें। जिन बीरों की हम सन्ताना, रीत नीत अपनी हैं नाना। उत्तर सुनहु मित्र वचन इक मोरा, इन ग्रन्थन मंह सत है थोरा। मिथ्या अंश बहुत है भाई, कहा लाभ यूं समय गंवाई। विष संयुक्त होय जो भोजन, मरिहै वाको खावहि जो जन। हम मानहिं इतिहास पुराना, नहीं मानहिं मिथ्या उपखाना। जिनको तुम कहते इतिहासा, वे इतिहास नहीं उपहासा। नाम पुराण जिन्हें है दीना, नाम व्याज जग सों छल कीना। ब्राह्मणानीतिहासान् पुराणानि कल्पान् गाथा नाराशंसीरिति।। – गृह्यसूत्र चौपाई शतपथादि ब्राह्मण अभिरामा, ऐतिह्य पुराण उन्हीं को नामा। गाथा नाराशंसी कल्पा, यह सब ब्राह्मण नाम विकल्पा। नहीं भागवत आदि पुराना, इनका सुनना व्यर्थ सुनाना। जो यह प्रश्न उठे तुव मन में, सत्य अंश जो इन ग्रन्थन में। ग्रहण करे अरु झूठ तियागे, पुण्य मिले अरु पाप न लागे। सुन याको अत्तर दे काना, पठन योग्य क्यों नहीं पुराना। इन ग्रन्थन में जे सत वचना, वह सब वेद विहित है रचना। जो मिथ्या सो इनके घर का, झूठ करे कल्याण न नर का। सब सत रूप वेद स्वीकारे, पुन क्यों भटके मारे मारे। मिथ्यामय सत ग्रहण न करिये, विष से युक्त अन्न खा मरिये। वैदिक मत मेरा जिज्ञासु, वेदामृत पी धर्म पिपासु। हम वह करहिं जो वेद विधाना, चतुर्वेद मानहिं परिमाना। जो सब आर्य एक मत होवें, कलह मिटे दुख दारिद खोवें। प्रश्न देखे आर्ष ग्रन्थ हम सारे, हैं विरोध उन मंह भी भारे। सृष्टि विषय में यह छः दर्शन, रखें परस्पर बहु संघर्षन। मीमांसा मंह कर्म प्रधाना, वैशेषिक ने काल प्रमाना। न्याय शास्त्र की यह व्युत्पति, परमाणु सों जगदुत्पति। योग कहे केवल पुरुषारथ, प्रकृति माने सांख्य यथारथ। कह वेदान्त ब्रह्म से सर्गा, पारब्रह्म सों सर्ग विसर्गा। यह विरोध छः दर्शन मांही, बिन विरोध कोउ पुस्तक नांही। उत्तर सुन जिज्ञासु बात हमारी, भुल हुई तुम से अति भारी। हैं वेदान्त सांख्य द्वै दर्शन, जिन मंह सृष्टयुत्पत्ति विमर्पण। शेष चार मंह सृष्टि रचना, नहीं प्रसिद्ध लिखा कोउ वचना। इन मंह भी पुन नहीं विरोधा, नहीं विरोध का तुम को बोधा। हो विरोध किस थल पर भाई, यही बात तुम जान न पाई। एक विषय अथवा नाना में, क्या विरोध रहता है तामें। यदि यह कहो विषय हो एका, उस पर होवें कथन अनेका। कहें परस्पर सब विपरीता, याको कहें विरोध सुनीता। यही अवस्था छः दर्शन की, सृष्टि विषय पर संघर्षण की। तौ सुनिये उत्तर धरि ध्याना, शास्त्रों का तुम भेद न जाना। इक विद्या वा दो बतलावें, याको जान भेद सब पावें। एकहि विद्या है जग जाने, विषय भिन्न पुन लोक क्यों मानें। वैद्यक ज्योतिष विषय अनेका, अनिक विषय वरु विद्या एका। इक विद्या के बहुतर अंगा, भिन्न भिन्न प्रतिपादन ढंगा। तथा सृष्टि की विद्या एका, छः अवयव मुनि कहें अनेका। इक इक अंग सभी ने लीना, अंग अंग प्रतिपादित कीना। यथा प्रजापति घड़ा बनावे, कर्म काल पुरुषार्थ लगावे। मट्टी से पुन कर निर्माना, इन कारण ते घट को जाना। तथा सृष्टि रचना के कारण, हैं अनेक यह बात साधारण। कारण कर्म एक हौं जाना, मीमाँसा ने उसे बखाना। व्याख्ना काल वैशेषिक कीनी, एक विषय पर निज मति दीनी। उपादानहुं न्याय बखाने, पुरुषारथ को योग पछाने। क्रम से तत्व गणन को भाखा, सांख्य शास्त्र यह निज मत राखा। अरु निमित्त कारण जो ईश्वर, व्याख्या की वेदान्त मुनीश्वर। या में नाहीं कछु विरोधा, क्या जानें न बाल अबोधा। वैद्यक शास्त्र यथा नहीं दोऊ, अकि अंग राखे पुन सोऊ। पथ्य चिकित्सा औषधि दाना, परिचर्या अस रोग निदाना। भिन्न प्रकरण भिन्न प्रतिपादक, रोग निवारण के सब साधक। तिमि सृष्टि के हैं छः कारण, समझ सोच न भ्रांति निवारण। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)