०३८ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (१६) December 27, 2019 By Arun Aryaveer Download तृतीय समुल्लास भाग (१६) जीवात्मा के लक्षण इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङगमिति।। – न्याय० अ० १। आ० १। सू० १०।। जीवातम के यह छः लक्षण, जानहिं पंडित बुद्धि विचक्षण। इच्छा द्वेष यतन अरु ज्ञाना, सुःख दुःख जो होवें नाना। जीव माँझ इनका है वासा, छः गुण आतम मध्य प्रकासा। प्राणाऽपाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङगनि।। – वै० अ० ३। आ० २। सू० ४।। चौपाई प्राणापान निमेष उन्मेषा, प्राण रु मन गति चाल विशेषा। विषय ग्रहण इन्द्रिय के द्वारा, क्षुत्पिपास ज्वर आदि विकारा। सुख दुख इच्छा द्वेष प्रयतना, जीव कर्म गुण जानहु जतना। युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङगम्।। – न्याय०। अ० १। आ० १। सू० १६।। चौपाई जाते एककाल मँह एका, ग्रहण करे नहीं वस्तु अनेका। वह मन है यह शास्त्र बखानें, मन की गति अति तीक्षण जानें। अथ गुण वर्णन रूपरसगन्धस्पर्शाः संख्याः परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वाऽपरत्वे बुद्धयः सुखदुःखेच्छाद्वेषौ प्रयत्नाश्च गुणाः।। – वै० । अ० १। आ० १। सू० ६।। चतुर्विंशति गुण विख्याता, नित संबंध गुणी सो भ्राता। रूप गंध रस और स्पर्शा, पंडित जन नित करें विमर्षा। पार्थक्य संख्या परिमाना, योग विभाग उभय गुण माना। परता और अपरता बुद्धि, जान पाय जो हो मति शुद्धि। सुख दुख इच्छा द्वेष प्रयतना, कैसे जान पाय बिनु जतना। गुरुता द्रवता स्नेह संस्कारा, धर्माधर्म चुबीस प्रकारा। गुण के लक्षण द्रव्याश्रय्यगुणवान् संयोगविभागेष्वकारणमनपेक्ष इति गुणलक्षणम्।। – वै०। अ० १। आ० १ । सू० १६।। नित्य रहे गुण गुणी अधारे, दूसर गुण नहीं निज मँह धारे। नहीं संयोग वियोगे कारन, करे अपेक्षा सदा निवारन। यह लक्षण हैं गुण के ज्ञानी, ऋषि कणाद उचरी यह बाणी। शब्द लक्षण क्षोत्रोपलब्धिर्बुद्धिनिर्ग्राह्यः प्रयोगेणाऽभिज्वलित आकाशदेशः शब्दः।। – महाभाष्य।। चौपाई कानों से जाको सुन पाए, बुद्धि द्वारा जिसे लखाए। बिना प्रयोग प्रकाश न जाका, केवल गगन देश है ताका। शब्द कहें मुनि वाको नामा, बार-बार मुनि गण परनामा। नयना ग्रहण करें नित जाको, रूप नाम जाने नर ताको। रसना जिससे मीठे खारे, ग्रहण करे वह ‘रस’ है प्यारे। दुर्गन्धि वा होय सुगन्धि, नासा ग्रहण करे वह ‘गन्धि’। त्वग् द्वारा जिसकी अनुभूति, ‘स्पर्श’ नाम जाको तन छूती। हलका भारी है परिमाना, है ‘पृथक्त्व’ संज्ञा विलगाना। टुकड़ों का मिलना ‘संयोगा’, संज्ञा खंड विभाग ‘‘वियोगा’’। निकट ‘अपर’ ‘पर’ दूरहिं कहिये, सद् असद् ‘बुद्धि’ सों गहिये। ‘सुख’ कहते जो होय आनन्दा, दुख है नाम कष्ट का मंदा। ‘इच्छा’ राग अरु द्वेष विरोधा, द्वेष से उपजे मन मँह क्रोधा। ‘यंत्र’ नाम है बल पुरुषारथ, उद्यम सों सब कर्म सकारथ। ‘द्रवता’ पिघलन ‘गुरुता’ भारी, जानत हैं सब नर अरु नारी। ‘स्नेह’ नाम प्रीति चिकनाई, संस्कार पुन वासना भाई। संगति से होवे संस्कारा, संगति से आचार विचारा। काठिन्यादिक न्यायाधारा, या को धर्म कहे संसारा। कोमलतादिक अरु दुष्कर्मा, वाकी संज्ञा जान अधर्मा। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)