०३६ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (१४) December 27, 2019 By Arun Aryaveer Download तृतीय समुल्लास भाग (१४) परीक्षा पाँच प्रकार से होती है पंचविधि की होय परीक्षा, या ते होवे सत्य समीक्षा। प्रथम परीक्षा सुनहु बखानूं, सत्यासत्य परख कर जानूं। जो ईश्वर गुण कर्म स्वभावा, चतुर्वेद प्रतिपादित भावा। जो कछु है उसके अनुकूला, वहा सत्य संतत सुख मूला। दूसर परख सत्य की कहिये, सृष्टि क्रम प्रतिकूल न गहिये। विश्व सृजन के जो अनुसारा, वही सत्य सुंदर सुख सारा। श्रवण आत का सदुपदेशा, मन मँह करे न संशय लेशा। चौथी परख आत्म की शुद्धि, सब जीवों में हो सम बुद्धि। पंचम जानहु अष्अ प्रमाना, हैं प्रत्यक्ष शबद अनुमाना। अर्थापत्ति अरु उपमाना, जिन ते बढ़े सत्य विज्ञाना। संभव अरु ऐतिह्य अभावा, इन ते पाखों सत्य प्रभावा। अथ अष्ट प्रमाणों का लक्षण इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पत्रं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्।। – न्याय अ० १ ं आ० १ । सूत्र ४ प्रत्यक्ष ज्ञान चौपाई इन्द्रिय से जब जुड़े पदारथ, तब होवे प्रत्यक्ष यथारथ। इन्द्रिय का मन से संजोगा, मन आतम कर होवे योगा। हो प्रत्यक्ष ज्ञान हितकारी, अव्यपदेशी अव्यभिचारी। नाम नामि संयोगज ज्ञाना, न्याय शास्त्र व्यपदेशी माना। यथा कहे कोई जल ले आओ, है परयोजन पानी लाओ। पानी द्रव्य पियास बुझावे, जल संज्ञा कोई देख न पावे। संज्ञा नहीं अर्थ संयोगा, हो प्रत्यक्ष द्रव्य उपभोगा। व्यभिचारी प्रत्यक्ष न जाने, वह तो वह भूल सम माने। यथा रात्रि मँह लख का खंभा, मानस समझा नहीं अचम्भा। प्रात रात्रि मँह लख का खंभा, मानस समझा नहीं अचम्भा। प्रात होय निश्चय का जाना, याहि कह व्यभिचारी ज्ञाना। व्यवसायात्मक निश्चित ज्ञाना, जिसमें होय न भ्रम का भाना। राम खड़ा वा कृष्ण खड़ा है, जब लग यह सन्देह पड़ा है। तब लग जानहु अव्यवसायी, सत्य परीक्षा होय न भाई। अनुमान अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतो दृष्ट९च।। – न्याय० ।। अ० १। आ० १। सू० ५।। चौपाई एक देश में द्रव्य जो देखा, अन्य ठौर पुन वह अवलेखा। अंश मात्र अथ देखा सारा, मन महँ पुन तत्काल विचारा। निश्चय यह तो वही पदारथ, यह जानहु अनुमान यथारथ। बिन प्रत्यक्ष न हो अनुमाना, परख हेतू दूसर परमाना। धूम देख अग्नि अनुमाने, पिता देख पुत्रहिं पहिचाने। सुख दुख देख जगत् के नाना, पूर्व जन्म का हो अनुमाना। अनुमानहुँ के तीन प्रकारा, प्रथम ‘पूर्ववत्’ करहिं विचारा। मेघ देख वर्षा अनुमाने, हो विवाह सन्तति अनुमाने। कारण देख कार्य को ज्ञाना, होय पूर्ववत यह अनुमाना। नाम ‘शेषवत्’ दूसर कहिये, कार्य देख कारण को गहिये। सुत को देख पिता कँह जाने, बादरु लखि वर्षा अनुमाने। रचना लख कर रचने हारा, सुख दुख देख आचार विचारा। सामान्यतो दृष्ट साधारण, कोई काहू का कार्य न कारण। संग रहे इक धर्म समाना, यह तृतीय जानहु अनुमाना। एक ठौर से दूसर जाए, बिनाचले कोई जान न पाए। गति साधर्म्य देख मन ठाना, गति से होवे आना जाना। ‘अनु’ का अर्थ अनन्तर जाने, ‘मान’ अर्थ ‘उत्पति’ पहिचाने। पूर्व प्रत्यक्ष पाछे अनुमाना, यथा धूम लख अग्नि जाना। उपमान प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधनमुपमानम्।। -न्याय० ।। अ० १ ।। आ० १ ।। सू० ६।। चौपाई जो साधर्म्य होय विख्याता, उससे साधें साध्य को ज्ञाता। वह साधन उपमान कहावे, सिद्ध साध्य साधर्म्य लखावे। यथा कहे कोई ‘‘रामहिं लाओ’’, काज आवश्यक शीघ्र बुलाओ। पर वह बोले ‘‘राम न जानूं’’, क्योंकर रामहिं मैं पहिचानूं। जिमि देखो तुम कृष्ण की सूरत, वही अनुहार राम की मूरत। गया तुर्त वह पहुंच ठिकाने, रामहिं देख शीघ्र पहिचाने। निश्चय भया राम जब दीखा, रूप रंग सब कृष्ण सरीखा। शब्द आप्तोपदेशः शब्दः।। -न्याय० । अ० १ । आ० १ । सू० ७।। चौपाई आप्त पुरुष उपदेश बखाने, शब्द प्रामाणिक उस का माने। कीजे श्रवण आप्त का लक्षण, धर्म धुरंधर पठित विचक्षण। परोपकारी अरु सतवादी, उद्यमशील जितेन्द्रिय त्यागी।। पृथिवी से ईश्वर पर्य्यन्ता, यावन्मात्र पदार्थ अनन्ता। भली भाँति सब का कर ज्ञाना, पुन उपदेश करे कल्याना।। ऐसे पुरुष और परमेश्वर, आप्त कहावें योग योगेश्वर। चतुर्वेद उनके उपदेशा, या में संशय भ्रम नहीं लेशा। वेद वचन है शब्द प्रमाना, जो माने पावे सुख नाना। ऐतिह्य न चतुष्ट्वमैतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात्।। – न्याय० ।। अ० २ । आ० २ । सू० १ ।। चौपाई है ऐतिह्य चरित जीवन का, राज राजर्षि अरु धीमान् का। पढ़ इतिहास पुरातन जाने, सुपथ कुपथ दोनों पहिचाने। निज इतिहास सुमार्ग बतावे, भावी जग को मार्ग दिखावे। अर्थापत्ति बिन कारण कारज नहीं संभव, मेघ बिना जिमि वृष्टि असम्भव। याको अर्थापत्ति नामा, छठा प्रमाण ज्ञान को धामा। संभव सप्तम ‘संभव’ सत्य समूला है प्रमाण सृष्टि अनुकूला। बात असंभव कोऊ न माने, जो संभव सो सत्य प्रमाने। रंगे स्यार साधु लंगोड़े, जैसे हाँकें गप्प गपोड़े। हमने देखा मृतक जिवाना, बिना पिता के भई सन्ताना। अँगुरि पर गिरि अमुक उठाये, सागर में पत्थर तैराये। चांद किया दो टुकड़े भाई, जन्मा ईश्वर मिली बधाई। मानस के सिर सींग उगावें, वंध्या सुत का विवाह करावें। कोरी गप्प असंभव बैना, कानों सुनीं न देखी नैना। अभाव जहाँ न होय पदारथ भावा, जानहिं वहाँ प्रमाण अभावा। यथा कहे कोई ‘हाथी लाएँ’, पर वहाँ हाथी देख न पाएँ। जहाँ होय हाथी उत जावे, वहाँ जाय हाथी ले आवे। अष्ट प्रमाणहिं जो मन धारे, पुन वह सत्यासत्य विचारे। पाँच भाँत की यही परीक्षा, करहि सो जानहि सत्य समीक्षा। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)