०३२ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (१०) December 27, 2019 By Arun Aryaveer Download तृतीय समुल्लास भाग (१०) श्लोक इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु। संयमे यंतमातिष्ठेद् विद्वान् यन्तेव वाजिनाम्।। – मनु० २। ८८ इन्द्रियाणां प्रसङेग्न दोषमृच्छत्यसंशयम्। सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं नियच्छति।। -मनु० २ । १३ चौपाई सारथि सम शुभ पन्थ चलाओ, विषय कूप नहीं गिरे बचाओ। इन्द्रिय वश जीवातम भाई, दुख पावे नाना गिर खाई। जो इन्द्रिय वश दुष्टाचारी, सुकृत क्रिया तस निष्फल सारी। निष्फल यज्ञ वेद तप त्यागा, शुभ गति पाए न कभी अभागा। श्लोक वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च। न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कहिंचित्।। – मनु. २ । १७ चौपाई वेद पाठ स्वाध्याय क्रियाएँ, यह सब नित्य कर्म सरसाएँ। हवन करें नित पढ़ें ऋचाएँ, अनध्याय नागा नहीं पाएँ। जैसे रुके न श्वास प्रश्वासा, विना श्वास नहीं जीवन आसा। ऐसेहि जानो यह नित कर्मा, कबहुं न छोड़े जीवन धर्मा। दुष्कृत मँह नित नागा करिये, सुकृत कर्म नागा परिहरिये। वेदोपकरणे चैव स्वाध्याये चैव नैत्यके। नानुरोधोऽस्त्यनध्याये होममन्त्रेषु चैव हि।। १।। नैत्यके नास्त्यनध्यायो ब्रह्मसत्रं हि तत्स्मृतम्। ब्रह्माहुतिहुतं पुण्यमनध्यायवषट्कृतम्।। २ ।। – मनु० २ । १०५-१०६ चौपाई जो नर नम्र सुशील स्वभावा, आज्ञा पालक गुरु मन भावा। सो आयु बल विद्या पावे, नर नारी तस कीरति गावे। श्लोक अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्द्धन्त आयुर्विद्या यशो बलम्।। – मनु० अ० २ । १२१ अहिंसयैव भूतानां कार्यं श्रेयोऽनुशासनम्। वाक् चैव मधुरा श्लक्ष्णा प्रयोज्या धर्ममिच्छता।।१।। यस्य वाङ्मनसे शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा। स वै सर्वमवाप्रोति वेदान्तोपगतं फलम्।।२।। – मनु० १५१ । १६० चौपाई पण्डित जन का कर्म प्रधाना, अन्ध कूप से जगत बचाना। बैर त्याग उपदेश सुनाएँ, सब को सन्मार्ग पर लाएँ। शील सहित सत मीठा बोलें, करि उपदेश ज्ञान दृग खोलें। जो चाहे नर धर्म उधारन, पाप पंक सों जगत उबारन। सत आचरे सत्य उच्चारे, सत के बल से झूठ पछारे। पावन मन अरु वाणी जाँकी, ब्रह्म वेद की देखें झाँकी। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)