सकल जगत के उत्पादक हे April 13, 2020 By Arun Aryaveer Download अथ-ईश्वर-स्तुति-प्रार्थनोपासनामन्त्राः ओ3म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव। यद् भद्रन्तन्न ऽ आसुव।। 1।। (यजु अ.30/मं.3) सकल जगत के उत्पादक हे, हे सुखदायक शुद्ध स्वरूप। हे समग्र ऐश्वर्ययुक्त हे, परमेश्वर हे अगम अनूप।। दुर्गुण-दुरित हमारे सारे, शीघ्र कीजिए हमसे दूर। मंगलमय गुण-कर्म-शील से, करिए प्रभु हमको भरपूर।। हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक ऽ आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 2।। (यजु.अ.13/मं.4) छिपे हुए थे जिसके भीतर, नभ में तेजोमय दिनमान। एक मात्र स्वामी भूतों का, सुप्रसिद्ध चिद्रूप महान्।। धारण वह ही किए धरा को, सूर्यलोक का भी आधार। सुखमय उसी देव का हवि से, यजन करें हम बारंबार।। य ऽ आत्मदा बलदा यस्य विश्व ऽ उपासते प्रशिषं यस्य देवाः। यस्य छाया ऽ मृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 3।। (यजु.अ.25/मं.13) आत्मज्ञान का दाता है जो, करता हमको शक्ति प्रदान। विद्वद्वर्ग सदा करता है, जिसके शासन का सम्मान।। जिसकी छाया सुखद सुशीतल, दूरी है दुःख का भंडार। सुखमय उसी देव का हवि से, यजन करें हम बारंबार।। यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक ऽ इद्राजा जगतो बभूव। य ऽ ईशे ऽ अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 4।। जो अनन्त महिमा से अपनी, जड़-जंगम का है अधिराज। रचित और शासित हैं जिससे, जगतिभर का जीव समाज।। जिसके बल विक्रम का यश का, कण-कण करता जयजयकार। सुखमय उसी देव का हवि से, यजन करें हम बारंबार।। येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढ़ा येन स्वः स्तभितं येन नाकः। यो ऽ न्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम।। 5।। (यजु.अ.32/मं.6) किया हुआ है धारण जिसने, नभ में तेजोमय दिनमान। परमशक्तिमय जो प्रभु करता, वसुधा को अवलम्ब प्रदान।। सुखद मुक्तिधारक लोकों का, अन्तरिक्ष में सिरजनहार। सुखमय उसी देव का हवि से, यजन करें हम बारंबार।। प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव। यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्।। 6।। (ऋ.म.10/सू.121/मं.10) जड़ चेतन जगति के स्वामी, हे प्रभु तुमसा और नहीं। जहां समाए हुए न हो तुम, ऐसा कोई ठौर नहीं।। जिन पावन इच्छाओं को ले, शरण आपकी हम आएं। पूरी होवें सफल सदा हम, विद्या-धन-वैभव पाएं।। स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा। यत्र देवा ऽ अमृतमानशानास्तृतीये ध्ाामन्न- ध्यैरयन्त।। 7।। (यजु.अ.32/मं.10) भ्राता तुल्य सुखद् वह ही प्रभु, सकल जगत् का जीवन प्राण। मानव के सब यत्न उसी की, करुणा से होते फलवान।। सदानन्दमय धाम तीसरा, सुख-दुःख के द्वन्द्वों से दूर। करके प्राप्त उसे ज्ञानी जन, आनन्दित रहते भरपूर।। अग्ने नय सुपथा राये ऽ अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुराणमेनो भूयिष्ठान्ते नम ऽ उक्तिं विधेम।। 8।। (यजु.अ.40/मं.16) स्वयं प्रकाशित ज्ञानरूप हे ! सर्वविद्य हे दयानिधान। धर्ममार्ग से प्राप्त कराएं, हमें आप ऐश्वर्य महान्।। पापकर्म कौटिल्य आदि से, रहें दूर हम हे जगदीश। अर्पित करते नमन आपको, बारंबार झुकाकर शीश।।