०७३ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (२४) January 10, 2020 By Arun Aryaveer Download चतुर्थ समुल्लासःभाग (२४) दोहा अंबिका अंबालिका अंबा तीनों नार। तीनों विधवा छाँड़ कर, चले गये भर्तार।। उन तीनों ने ब्यास नियोगे, सन्तति हेतु भोग पुन भोगे। विदुर पाण्डु धृतराष्ठर जाए, महावीर योधा कहलाये।। प्रोषितो धर्मकार्यार्थं प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः। विद्यार्थं षड् यशोऽर्थं वा कामार्थं त्रींस्तु वत्सरान् ।। १।। वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजाः। एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी।। २।। – मनु० ९ । ७६ । ८१ धर्म काज को पति यदि जावे, आठ वर्ष कोऊ सुधि नहीं आवे। करे नियोग विवाहित नारी, होवे वा सन्तान सुखारी। जो विद्या यश गया कमाने, पता न पाये ठौर ठिकाने। तो छः वर्ष बाट तिस देखे, बहुरि नियोगी नर कोऊ पेखे।। गया यदि करने व्यापारा, तीन वर्ष तक रखे सहारा। जबहु विवाहित आवे भर्ता, छूटे तुर्त नियोगी धर्ता।। एसे हि नियम पुरुष के जानें, शास्त्र विहित नियमो को मानें। आठ वर्ष बंध्या को देखे, बहुरि अन्य विधवा अवलेखे।। सन्तति होवे मर मर जावे, दशवें वर्ष नियोग करावे। कन्या उपजे पुत्र न जाये, ग्यारस वर्ष नियोग कराए।। जली कटी बिरथा बकवादिन, तुर्त नार त्यागहु उन्मादिन। अन्य नार सों सुत उपजाये, ब्याह न दूसर कबहुं कराए।। जो नर हो अति ही दुखदायी,मार पीट करता हरजाई। वाको नारी तजे तुरन्ता, राखे अन्य नियोगी कन्ता।। अनिक युक्ति अरु शास्त्र प्रमाना, विषय नियोग वेद ने माना। कर नियोग अरु ब्याह स्वयंवर, कुल उन्नत करते आरज वर।। क्षेत्रज औरस सम अधिकारी, इन की जाति न न्यारी न्यारी। दोनों सम पितृ धन भागी, मातृ पितृ कुल के अनुरागी।। ताँते वीर्य न खोएं अकारथ, वीरज है इक रत्न पदारथ। पर नारी अरु वेश्या गामी, महा मूढ़ दुर्व्यसनी कामी।। इनते अनपढ़े कृषक समाना, मूल्य बीज का उसने जाना। ‘‘आत्मा वै जायते पुत्रः’’ ब्राह्मण ग्रन्थों की यह बानी, ऋषि मुनि जन सब ने सन्मानी।। अङग्दङगत्सम्भवज्सि हृदयादधि जायसे। आत्मासि पुत्र मा मृथाः स जीव शरदः शतम्।।१।। – निरु० ३ । ४ अंग अंग से तव संभूति, अहो पुत्र मम हृदय विभूति। ताँते तू आत्मज है मेरा, शत वर्षी हो जीवन तेरा।। ऐसे ऐसे पुरुष महाना, वीरज सों जनमे सन्ताना। उस वीरज को व्यर्थ गँवावे, वेश्या नीच नार के जावे।। सद्भूमि में वरज खोटा, बोना पाप भयंकर मोटा। प्रश्न आवश्यकता क्या ब्याह की, फँसे कीच मँह पाँय। जीवन भार बंधन रहे, नेक न सुःख उठाँय।। चौपाई आजीवन बंधन दुखदायी, ब्याह में लखी न कोई भलाई। ताँते जब लग होवे प्रीति, पूरी करें प्रेम की रीति; जब नर नारी लड़ने लागें, अपने अपने मारग लागें।। यह पशु पंछिन को व्यवहारा, इससे फैले दुष्टाचारा। कोऊ काहू की करे न सेवा, रहे न कोऊ पानी देवा।। अनाचार फैले व्यभिचारा, दुर्बल रोगी हो संसारा। काहू को भय रहे न लाजा, होने लागे काज अकाजा।। लाखों वंश नष्ट हो जावें, नहीं घर घाट ठौर कोऊ पावें। रहे न कोउ सम्पति अधिकारी, लंपट होंगे सब नर नारी; ताँते ब्याह आवश्यक प्यारे, अगनित दोष विवाह निवारे।। प्रश्न एक विवाह एक हूं नारी, जीवन भर दोऊ रहें दुखारी। नार सगर्भा अथ चिर रोगी, विषय भोग हित नहीं उपयोगी। अथवा पुरुष रोग का मारा, नहीं नार को भोगन हारा। रह न सकें यौवन मतवारे, कहो जाँय वे किसके द्वारे। उत्तर जो रह सकें नहीं बिन भोगा, वे संतति हित करें नियोगा। वेश्यादिक के निकट न जांए, पाप मांहि मत पाँव फँसाए। मन चाहे अप्राप्त पदारथ, सो उद्यम से होंय सकारथ। प्राप्त वस्तु की रक्षा कीजे, रक्षित की वृद्धि कर लीजे। बढ़ी हुई संपति को प्यारे, खर्च करो नित देश उपकारे। निज निज वर्णाश्रम व्यवहारा, तन मन धन सों करो सुधारा। सास ससुर पितु माता सेवहु, ताँते मुंह माँगा फल लेवहु। नरपति मित्र पड़ोसी नाना, सज्जन वैद्य और विद्वाना। उनसे मन में राखहु सुधारा, गिरे हुओं को देहु सहारा। निज संतति विद्वान बनाओ, सद्विद्याएं इन्हें पढ़ाओ। साथ साथ कर मुक्ति साधन, धर्म करो त्यागो अपराधन। इस प्रकार के श्लोक न मानें, वेद विरुद्ध जो बात बखानें। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)