०५२ स. प्र. कवितामृत चतुर्थ समुल्लास (०३) January 3, 2020 By Arun Aryaveer Download चतुर्थ समुल्लासःभाग (०३) सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता भर्त्रा भार्य्या तथौव च। यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै धुवम्।। – मनु० ३ । ६० नारी से नर नरसों नारी, जँह प्रसन्न तँह संपति सारी। उस कुल में लक्ष्मी को वासा, बढ़ता रहे भाग्य का पासा। जँह विरोध नित कलह लड़ाई, सदा कँगाली रहती छाई। अहो स्वयंवर रीति सुहानी, आर्य्यवर्त में रही पुरानी। सर्वोत्तम है वही विवाहा, वही ब्याह जो हो चित चाहा। युवा सुवासाः परिवीत आगात् उ श्रेयान्भवति जायमानः। तं धीरांस कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो३ मनसा देवयन्तः ।। १ ।। – ऋ मं० ३ । सू० ८ । मं० ४ आ धेनवो धुनयन्तामशिश्वीः सबर्दुघाः शशया अप्रदुग्धाः। नव्यानव्या युवतयो भवन्तीमहद्देवानामसुरत्वमेकम्। – ऋ० मं० ३ । सू० ५५ । मं० १६ पूर्वीरहं शूरदः शश्रमाणा दोषावस्तोरुषसो जरयन्तीः। मिनाति श्रियं जरिमा तनूनामप्यू नु पत्नीवृषणो जगम्युः।। ३ ।। – ऋ मं० १ । सू० १७१ । मं० १ चौपाई ब्याह काल पर रखे विचारा, हो सबन्ध सब विधि अनुसारा वर कन्या का मेल न होवे, आजीवन घर बैठा रोवे। करे ब्याह आयु अति वाली, बृथा बीज बोये जिम माली। अप्रदुग्ध धेनु सी भोरी, कन्या सद्गुण रूप किशोरी। सुघर सुशीला यौवनमाती, दिव्य रमण प्रज्ञा को पाती। तरुण पति पा गर्भ सुधारे, भूल न बाल विवाह विचारे। नष्ट करे नर बाल विवाहा, नशहि नार दुख पाय अथाहा। दोनों लोक नष्ट हो जावें, बाल्य काल जो ब्याह करावें। जिस प्रकार चंचल श्रमकारी, समरथ सिंचन वीरज वारी। युवक प्राप्त कर नार किशोरी, यौवन मँह मद मान विभोरी। जियें वर्ष शत् अरु सुख पावें, पुत्र सपौत्र आनन्द मनावें। इस प्रकार वर्तें नर नारी, तो सृष्टि हो जाय सुखारी। कुण्डलिया ब्रह्मचर्य पूरन किये उत्तम विद्या पाय। धारण सुन्दर वस्त्र कर पूरन युवा सुहाय।। पूरन युवा सुहाय गृहस्थी फेर सम्भाले। जग में उन्नति करे कीरति धर्म कमाले।। बाकी विद्या धीरज अरु लख धर्महि निष्ठा। वह नर ऊँचा होय करें सब लोग प्रतिष्ठा।। जयगोपाल नहीं उन्नति पावें वे नर नारी। पाणि ग्रहण जो करें और नही हों ब्रह्मचारी।। चौपाई जब लग रही स्वयंवर रीति, सुख सम्पत्ति अरु रही सुनीति। ऋषि मुनि राजा अरु महाराजा, ब्रह्मचर्य रत आर्य समाजा। हो विद्वान स्वयंवर करते, नहीं अकाल मृत्यु सों मरते। उन्नति की चोटी पर भारत, सोहं सोहं देश पुकारत। भयी जब ब्रह्मचर्य की हानि, हुआ स्वयंवर एक कहानी। घर मँह आयी अविद्या रानी, नष्ट हुई सब प्रथा पुरानी। मात पिता आधीन विवाहा, सुत कन्या के मन अनचाहा। तब से भारत गिरता आया, आज तलक भी संभल न पाया। दुष्ट रीति यह त्यागो भाई, इससे नहीं कोई अधिक बुराई। करो ब्याह निज वर्ण सवर्णा, जो चाहो दुख सागर तरणा। गुण स्वभाव अरु कर्मनुसारा, वर्ण ज्ञान मँह रखो विचारा। प्रश्न ब्राह्मण मात पिता हों जाके, सुत ब्राह्मण होते हैं ताके। अब्राह्मण के ब्राह्मण जाये, वेद विरुद्ध यह वचन न भाये। उत्तर वेद विरुद्ध यह वचन न प्यारे, तुमने अपने ग्रन्थ विचारे। अब्राह्मण के ब्राह्मण जाए, होंगे हैं अरु होते आए। छान्दोग्य को पढ़िये भाई, कथा जाबाली ऋषि की आई। जाबाली की कुल अज्ञात, किस कुल के थे जनक रु मात। ब्राह्मण भे तप कर के बन में, विश्वामित्र क्षात्र कुल जनमें। थे मातंग ऋषि चंडाला, तप सों ब्राह्मण भे तत्काला। अब भी जो उत्तम विद्वाना, वे ब्राह्मण वे योग्य सुजाना। वही शूद जो मूर्ख अजाना, काला अक्षर भैंस समाना। प्रश्न रज वीरज सों बना शरीरा, कैसे हो परिवर्तित नीरा। अहो नाथ जब बदले पानी, संकर वर्ण होंय हौं जानी। वणिक पुत्र छत्री नहीं होवें, चहें आम और दाड़िम बोवें। उत्तर रज वीरज संयोगज देहा, देह पिंड आतम को गेहा। नहीं शरीर की ब्राह्मण जाति, जाति कर्म व्यवस्था लाती। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)