०३७ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (१५) December 27, 2019 By Arun Aryaveer Download तृतीय समुल्लास भाग (१५) धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्माभ्यां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम्।। – वै० अ० १ । आ० १ । सू० ४ ।। चौपाई जो नर कर धर्मानुष्ठाना, हो पवित्र पाकर पद ज्ञाना। जाने सब साधमय्र विधरमा, टूट जांय वाके सब भरमा। यथा भूमि जड़ अरु जड़ पानी, जड़ता दोऊन माँहि समानी। धर्म यही साधर्म्य समाना, विरुध धर्म वैधर्म बखाना। भू कठोर और कोमल नीरा, अगन तप्त जल सीतल सीरा। यह वैधर्म्य धर्म असमाना, जिसने इसका तत्व पछाना। द्रव्य गुणादिक छहो पदारथ, जान लिया जिस रूप यथारथ। वाक सहज मोक्ष मिल जावे, बहुरि न माया उसे फँसावे। पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि। – वै० अ० १ । आ० १ । सू० ५ । चौपाई पृथिवी जल मनतेज अकाशा, आतम काल वायु अरु आशा। द्रव्य कथित नव ऋषि कणादा, कर विचार नर छाँड प्रमादा। वाक सहज मोक्ष मिल जावे, बहुरि न माया उसे फँसावे। चौपाई पृथिवी जल मन तेज अकाशा, आतम काल वायु अरु आशा। द्रव्य कथित नव ऋषि कणादा, कर विचार नर छाँड प्रमादा। द्रव्य लक्षण क्रियागुणवतसमवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणम्।। – वै० । अ० १ । आ० १ । सू० १५ ।। द्रव्य क्रिया मय गुण मय जानें, क्रियावान गुण वत छहः माने। तीन विहीन क्रिया गुणवंता, दिशा काल आकाश अनन्ता। समवायि कारण युत लक्षण, जग महँ यह नव द्रव्य विलक्षण। रूपपसगन्धस्पर्शवती पृथिवी।। – वै० ं अ० २ । आ० १। सू० १।। चौपाई स्पर्श गंध रस रूप विराजे, चार गुणों से भूमि भ्राजे। अगन योग से हुई सरूपा, जल से रसमय भई अनूपा। स्पर्श मयी वायु के कारण, सकल पदारथ करती धारण। व्यवस्थितः पृथिव्यां गन्धः।। – वे० । अ० २ । आ० २ । सू० २।। चौपाई गन्ध स्वाभाविक पृथिवी मांही, जल में रस जिमि रहत प्रवाहीं। अग्नि मांहि व्यवस्थित रूपा, जिंह ते पावे द्रव्य सरूपा। स्पर्श स्वाभाविक पवन मँझारा, गगन माँहि सब शब्द पसारा। रूपरसस्पर्शवतय आपो द्रवाः स्त्रिग्धाः।। – वै० । अ० २। आ० १ । सू० २ ।। अप्सु शीतता।। – वै० । अ० २ । आ० २ । सू० ५।। चौपाई कोमलता रस रूप रु द्रवणा, स्पर्श गुणी है जल प्रस्त्रवणा। स्वाभाविक रस मय अरु सीरा, दोउ गुण युक्त व्यवस्थित नीरा। तेजो रूपस्पर्शवत्।। – वै० । अ० २ । आ० १ । सू० ३।। स्पर्शवान् वायुः।। – वै । अ० २। आ० १। सू० ४।। स्पर्श रूप वत तेजहुं जानें, रूप व्यवस्थित गुण पहिचानें। स्पर्श होय वायु की संगत, चमके भानु नखत दिवंगत। त आकाशे न विद्यन्ते।। – वै० । अ० २। आ० १ । सू० ५।। केवल शब्द गगन के माँही, शेष चार गुण इसमें नाँही। निष्क्रमणं प्रवेशनमित्याकाशस्य लिङग्म्।। – वै० । अ० २ । आ० १ । सू० २०।। है प्रवेश अरु निपट निकासा, याहि चिन्ह सों जान अकासा। कार्य्यान्तराप्रादुर्भावाच्च शब्दः स्पर्शवतामगुणः।। – वै० । अ० २। आ० १। सू० २५। स्पर्शगुणी पवनादिक जेते, शब्द हीन जानो सब तेते। केवल मात्र एक आकासा, करे शबद जिस माँहि निवासा। अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङगनि।। – वै० ं अ० २ । आ० २। सू० ६।। पहले पाछे अचिर चिरादि, है प्रयोग सों काल अनादि। नित्येष्वभावादनित्येषु भावात्कारणे कालाख्येति।। – वै० । अ० २। आ० २। सू० १।। जेते लखें अनित्य पदारथ, उन सब में है काल सकारथ। नित्य वस्तु में काल नहीं है, जहँ अनित्यता काल वहीं है। संज्ञा काल रहे कारण में, क्षणिक वस्तु जीवन मारण में। इत इदमिति यतस्तद्दिश्यं लिङगम्।। – वै० । अ० २। आ० २। सू० १०।। उत्तर दक्खन दाँएं बाँएं, उपर जाएं नीचे आएं। जिंह ते होवे यह व्यवहारा, दिशा नाम सर्वत्र पसारा। आदित्यसंयोगाद् भूतपूर्वाद् भविष्यतो भूताच्च प्राची।। – वे० अ० २। आ० २। सू० १४।। उदय होय भानु जिस ओरा, वाको कहें पूर्व की छोरा। अस्त होय पच्छम की आशा, रवि डूबे नहीं रहे प्रकाशा। दाँएं दकखन पच्छम वामा, चार दिशा सुन्दर अभिरामा। एतेन दिगन्तरालानि व्याख्यातानि।। – वै० अ० २। आ० २। सू० १६।। पूरब दक्खन कोण विराजे, आगिनेय दिक नाम सुसाजे। दक्खन पच्छम कोण सहारा, नैर्ऋति दिक् करे पसारा। उत्तर पच्छम कोण सुहावे, दिशा वायवी शास्त्र बतावे। उत्तर पूरब मध्य इशानी, शोभायुत यह कोण सुहानी। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)