०३१ स. प्र. कवितामृत तृतीय समुल्लास (९) December 27, 2019 By Arun Aryaveer Download तृतीय समुल्लास भाग (९) अथ यम नियम दोहा पाँच नियम और पाँच यम, भजहिं जो नर विद्वान। केवल नियम न सेवहिं, जो चाहत कल्यान।। चौपाई यम बिन नियम जो जन अपनावे, सो नर गिरे पतित हो जावे। शास्त्र कहें यम पाँच प्रकारा, सत्य अहिंसा चोर नकारा। ब्रह्मचर्य अभिमान विहीना, पंच विधि यम कहें प्रवीना। यमान् सेवेत सततं न नियमान् केवलान् बुधः। यमान्पतत्यकुर्वाणो नियमान् केवलान् भजन्।। – मनु. अ. ४ । २०४ तत्राहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः।। – योग० साधनपादे सूत्र ३० शोचसन्तोषतपः स्वाध्यायेधरप्राणिधानानि नियमाः।। – योग० साधनपादे सूत्र ३२ चौपाई तप सन्तोष शौच स्वध्याया, अरु ईश्वर प्राणिधान बताया। हर्ष शोक तज लाभ रु हानि, धर्महु त्यागे नहीं जो प्रानी। सन्तोषी उस नर को मानूँ, आलस को सन्तोष न जानूँ। जल सों स्नान निमज्जन धावन, वाको नाम शौच शुभ पावन। लाख कष्ट दुख चाहे आवे, धर्म कृत्य पुन करता जावे। शास्त्र इसी को तप बतलाए, धूनी ताप न तप कहलावे। चौथे पढ़ना और पढ़ाना, ईश भक्ति ईश्वर प्रणिधाना। कामातुरता भली न जानो, काम हीन भी उचित न मानो। कामातुरता नरहिं गिरावे, उत्तम नर को पशु बनावे। कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता। काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः।। – मनु० अ० २।२८ निपट निकामी मनुज निरर्थक, याको नाहीं शास्त्र समर्थक। लोप होंय सब वैदिक कर्मा, होंय समापत सृष्टि धर्मा। ताँते मनु ने कियो बखना, धर्म तत्व भल विधि सोई जाना। केहि विधि ब्राह्मी तनु हो भाई, सुनहु जो मनु, गाथा गाई। श्लोक स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः। महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राहीयं क्रियते तनुः।। – यजु० २ । २१ चौपाई स्वाध्याय व्रत होम त्रिविद्या, महायज्ञ यज्ञरु सुत इज्या। साधन अष्ट करहि नर धीरा, इनते होवहि ब्राह्म शरीरा। सब विद्या पढ़ना ‘स्वाध्याया’, अनपढ़ नर पाछे पछताया। ब्रह्मचर्य्य धारे सत बोले, सत्य तुला पर जिह्वा तोले। सत्य नियम दृढ़ होय निभावन, यही नेम यह व्रत अतिपावन। भूखों रहना व्रत नहीं होई, ऐसे व्रत से फल नहीं कोई। वैदिक ज्ञान उपासन कर्मा, यही त्रिविद्या कहिये धर्मा। पक्ष पक्ष जो इष्टि करिये, यह इज्या करि भव को तरिये। करि सुशील उत्पन्न सन्ताना, आज्ञा देंय वेद भगवाना। ब्रह्मदेव पितरों का याजन, अतिथि वैश्वदेव प्रिय भाजन। पंच महा यह यज्ञा बखाने, मनु शास्त्र नित नेम प्रमाने। अग्निष्ओमादिक सब यज्ञा, करहिं न जो ते पशु सम अज्ञा। अथवा शिल्प ज्ञान विज्ञाना, यज्ञ शब्द का अर्थ सुजाना। जो नर साधहिं आठो साधन, ब्राह्मी तनु पावें निर्बाधन। ब्राह्मी तनु है भजन अधारा, प्रभु को भजे तो होवे पारा। यह इन्द्रिय हैं अश्व समाना, रथ शरीर खैंचहिं मैं जाना। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)