शचीन्द्र नाथ सान्याल December 20, 2019 By Arun Aryaveer ग़दर पार्टी और अनुशीलन समिति जैसे संगठनों से जुड़े रहे महान क्रांतिकारी, बेमिसाल संगठनकर्ता, क्रांतिकारियों की एक पूरी पीढ़ी के पथप्रदर्शक, हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन जैसे क्रांतिकारी संगठन के संस्थापक शचीन्द्र नाथ सान्याल का जन्म वाराणसी में हरिनाथ सान्याल एवं वासिनी देवी के यहाँ 1893 में हुआ था। बचपन से ही देश की परतंत्रता की बात सुनकर अपार कष्ट अनुभव करने वाले शचीन्द्र घंटों एकांत में बैठ देश को आज़ादी दिलाने के ताने बाने बुना करते थे, पर तब कौन जानता था कि ये बच्चा आगे चलकर देश के लिए अपना सर्वस्व होम कर देगा। लार्ड कर्जन द्वारा 1905 में कुत्सित इरादे से किये गए बंगाल के विभाजन के बाद उभरी ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी लहर ने उस समय के किशोरों एवं नवयुवकों को राष्ट्रवाद की शिक्षा व प्रेरणा देने का महान कार्य किया। शचीन्द्र नाथ सान्याल और उनके पूरे परिवार पर इसका प्रभाव पडा और इसके फलस्वरूप ही चापेकर और सावरकर बन्धुओं की तरह सान्याल बन्धु भी साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रवादी धारा के साथ दृढ़ता के साथ खड़े हुए। 1908 में, जब शचीन्द्र मात्र 15 वर्ष के थे, उनके पिता की मृत्यु हो गयी और सबसे बड़े होने के नाते परिवार की जिम्मेवारी उन पर ही आ पड़ी। परन्तु कठिनाइयों के वावजूद शचीन्द्र न केवल देश की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध होकर स्वंय आगे बढ़ते रहे अपितु अपने तीनो भाइयो को इसी मार्ग पर ले चलने में सफल रहे। इनके अन्य तीन भाई क्रमश: रविन्द्र, जितेन्द्र व भूपेन्द्र थे और ये सभी सान्याल बंधु क्रांतिपथ के राही थे। 1908 में 15 वर्ष की आयु में ही शचीन्द्र ने काशी में अनुशीलन समिति क़ी स्थापना क़ी। हालांकि इसे बंगाल के क्रान्तिकारियों की अनुशीलन समिति क़ी शाखा के रूप में स्थापित किया गया था परन्तु बंगाल क़ी समिति से इस समिति का कोई सम्बन्ध नही हो पाया था। बाद में जब बंगाल क़ी अनुशीलन समिति अवैध घोषित कर दी गयी तो उन्होंने अपनी संस्था का नाम यंग मैन्स एसोसिएशन रख दिया जो धीरे धीरे अपने प्रारम्भिक स्वरुप व्यायामशाला से आगे बढकर ब्रिटिश विरोधी क्रांतिकारी संगठन बनने लगा। इस समय तक देश के पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक स्वाधीनता और स्वराज की अभूतपूर्व लहर उठ खड़ी हुई थी और तिलक का उदघोष, स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे, भारत का मंत्र बन चुका था। ऐसे में शचीन्द्र भी इस संघर्ष में पूरी तरह डूब चुके थे परन्तु इसी बीच उनका मन आध्यात्म की तरफ भागने लगा। अंडमान निकोबार में सजा के दौरान लिखी पुस्तक ” बंदी जीवन ” में शचीन्द्र लिखते हैं कि थोड़े समय ( लगभग 6 माह ) तक उन्होंने सत्य व ईश्वर की खोज में साधुओ , सन्यासियों का भी साथ पकड़ा, प्राचीन भारतीय दर्शन व साहित्य का भी अध्ययन किया और अंत इस नतीजे पर पहुंचे कि आध्यत्मिक गुरुओं ने सत्य की खोज या ईश्वर चिन्तन के नाम पर कर्म हीन जीवन अपना लिया है जिनका कोई उद्देश्य नहीं है, समाज के लिए कोई योगदान नहीं है और कोई दिशा नहीं है। शचीन्द्र 1911 में पांडिचेरी में महर्षि अरविन्द से मिलने गये, पर ये मुलाक़ात नही हो पायी और इसके बाद वे पुन: क्रांतिकारी जीवन में वापस लौट आये | उन्होंने सबसे पहले बंगाल के क्रान्तिकारियो के साथ सम्पर्क बनाने का प्रयास में 1912 में बंगाल की यात्रा की पर बात नहीं बनी| दोबारा 1913 में वे बंगाल के अनुशीलन समिति के नेताओं से मिलने गये, जिनमें शशांक मोहन , शिरीष और प्रतुल गांगुली प्रमुख थे। इन्ही के जरिये शचीन्द्र का परिचय चन्द्रनगर में रह रहे प्रसिद्ध क्रांतिकारी रास बिहारी बोस के साथ हुआ, जो शचीन्द्र की असाधारण कर्म शक्ति , सरलता, तत्परता और निष्ठा से अत्यंत प्रभावित हुए। आगे के क्रांतिकारी जीवन में शचीन्द्र नाथ, रास बिहारी बोस के अनन्य सहयोगी के रूप में ही आगे बढे | नवम्बर 1914 में दोनों ही बम-परीक्षण के दौरान घायल हो गये पर जल्दी ही ठीक होकर वे पुन: इस काम में जोर-शोर से जुट गये | दोनों ने मिलकर संगठन का विस्तार राजस्थान तक किया | राजस्थान में पहले से ही एक राष्ट्रवादी संगठन काम कर रहा था जिसे खड़ा करने में प्रमुख भूमिका महान राष्ट्रवादी श्याम जी कृष्ण वर्मा की थी | इसी संगठन के सदस्यों को साथ लेकर शचीन्द्र नाथ राजस्थान में संगठन के विस्तार के साथ-साथ दिल्ली में भी संगठन को बढाने का काम किया| पूरे देश में घूम घूम कर संगठन खडा करने और अलग- अलग कार्य कर रहे संगठनों को एक साथ लाने के पीछे उद्देश्य 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की तर्ज पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध देशव्यापी सैन्य बगावत के रूप में दूसरे स्वतंत्रता संग्राम को खड़ा करना था, जिसकी तैयारी देश एवं देश के बाहर वर्षों से चल रही थी। इसका पूरा संयोजन रासबिहारी बोस कर रहे थे और उनके दाहिने हाथ थे, शचीन्द्र नाथ सान्याल। गदर पार्टी और क्रांतिकारी संगठनों ने 1914 से शुरू हुए प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजो के फंसे होने के चलते कमजोर पड रहे अंग्रेजी शासन के विरुद्ध हिन्दुस्तानी सैनिको के विद्रोह के जरिये देश को पूरी तरह से स्वतंत्रत करा लेने का निर्णय लिया हुआ था | 21 फरवरी 1915 को इस सैन्य विद्रोह और स्वतंत्रता संग्राम को आरम्भ करने की तैयारी पक्की कर ली गयी थी, पर गद्दारों और सरकार के भेदियो के चलते इस योजना का पता ब्रिटिश हुकूमत को लग गया | भारी धरपकड गिरफ्तारी और दमन का चक्र चला | शचीन्द्र को भी 26 जून 1915 को गिरफ्तार कर लिया गया और फरवरी 1916 में उन्हें आजन्म कारावास एवं सारी सम्पत्ति की जब्ती की सजा देते हुए काले पानी भेज दिया गया। उनके छोटे भाई रवीन्द्र नाथ और जितेन्द्र नाथ की भी गिरफ्तारी हुई | रवीन्द्र नाथ को दो वर्ष की सजा हुई परन्तु दो वर्ष बाद भी उन्हें अपने घर में नजरबंद रखा गया | जितेन्द्र नाथ पर आरोप सिद्ध नही हो सका और बाद में उन्होंने चन्द्रशेखर आजाद व भगत सिंह के साथ काम किया| चार वर्षो तक अंडमान की सेल्युलर जेल में रहने के बाद शचीन्द्र के मामा ने उनकी माँ की तरफ से माफीनामे की अर्जी दी और उस पर कारवाई के बाद शचीन्द्र नाथ जेल से छूट कर वापस आ गये | शचीन्द्र नाथ ने अंडमान में कैदियों के प्रति किए जाते रहे अमानवीय व्यवहार की चर्चा उस समय के दिग्गज कांग्रेसी लीडरो से करते हुए महान क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर व अन्य कैदियों को छुडाने के लिए वीर सावरकर के भाइयों से मिलकर अत्यंत प्रयास किए, परन्तु कांग्रेसी नेताओ की उदासीनता के चलते उनके प्रयास व्यर्थ हो गये। अब शचीन्द्र नाथ पुनः बिखरे हुए क्रांतिकारी संगठनों को एक जुट करने के प्रयास में जुट गये परन्तु बाद में घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ने के फलस्वरूप उन्हें कई तरह के काम और व्यवसाय करने पड़े लेकिन क्रांतिकारी तेवर व संगठन के अभ्यस्त शचीन्द्र कहीं भी टिक नही सके | एक बार फिर से वो उत्तर भारत में क्रांतिकारी संगठनों के बनाने के निकल पड़े और 1923 तक उन्होंने पंजाब व संयुक्त प्रांत में पच्चीस क्रान्ति केन्द्रों की स्थापना कर दी| दिल्ली के अधिवेशन में उन्होंने अपने संगठन का नाम रखा–हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशंन रखा। बाद में चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह तथा उनके साथियो ने इसी संगठन का नाम एवं रूपांतरण हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक समाजवादी संगठन के रूप में किया था | दिल्ली के इसी अधिवेशन में शचीन्द्र नाथ ने देश के बन्धुओं के नाम एक अपील जारी करते हुए सम्पूर्ण भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य सामने रखा| उनके द्वारा ” रिवोल्यूशनरी ” लिखा गया पर्चा एक ही दिन में रंगून से पेशावर तक बांटा गया, जिसमें यह सपष्ट किया गया था कि देश की स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी संघर्ष अनिवार्य है और उसके लिए देश में एक बृहद संगठन आवश्यक है | इस पर्चे को लिखने और वितरित करने के आरोप में उन्हें फरवरी 1925 में दो वर्ष की सजा हुई | छूटने के बाद काकोरी केस में पुन: गिरफ्तार किया गया और दुबारा काले पानी की सजा दी गयी | 1937-38 में कांग्रेस मंत्री मंडल ने जब राजनैतिक कैदियों को रिहा किया तो उसमे शचीन्द्र नाथ भी रिहा किये गए, लेकिन उन्हें घर पर नजरबंद कर दिया गया | कठिन परिश्रम कारावास और चिन्ताओ से वे क्षय ग्रस्त हो गये और 7 फरवरी 1942 को गोरखपुर जेल में भारत का यह महान क्रांतिकारी जर्जर शरीर के साथ आँखों में माँ को मुक्त कराने का स्वप्न लिए चिर निद्रा में सो गया | दो-दो बार काले पानी की सजा काटने वाला, अपनी आयु का प्रत्येक क्षण स्वतंत्रता संघर्ष के लिए समर्पित करने वाला यह अनमोल क्रांतिकारी हम सभी के लिए स्मरणीय और पथ प्रदर्शक है| शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि । ~ लेखक : विशाल अग्रवाल~ चित्र : माधुरी Leave a Reply Cancel replyYour email address will not be published. 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