०२१ स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (५) December 19, 2019 By Arun Aryaveer Download द्वितीय समुल्लासः भाग (5) दोहा एक वर्ष ते पाँच तक, जननी ही गुरु जान। आठ वर्ष तक जनक पुन, रखे शिशु का ध्यान।। चौपाई नवमें वर्ष धार उपवीता, गुरुकुल माँहि निवास पुनीता। बालक कन्या दोऊ पढ़ावें, इह विधि सन्तति सभ्य बनावें। पठन काल मँह त्यागे लाड़न, दोष होय तो चाहिये ताड़न। महाभाष्य का वचन प्रमाना, पात९जलि अस ग्रन्थ बखाना। ताड़न सों जो बाल पढ़ावें, अमृत निज कर ताहि पिलावें। लालन जानहु विष कर पाना, लालन से बिगरे सन्ताना। लालन विष सम है भयकारी, औषध सम ताड़न गुणकारी। भय नयनन में करुणा मन में, ऐसा भाव रखे शिष्यन में। श्लोक सामृतैः पाणिभिर्घ्रन्ति गुरवो न विषोक्षितैः। लालनाश्रयिणो दोषास्ताडनाश्रयिणो गुणाः।। – महाभाष्य । ८ । १ । ८ दोहा चोरी जारी झूठ अरु, मद पानादिक पाप। सिख दे इन के त्याग की, यह जीवन के ताप।। चौपाई एक बार प्रगटे जब चोरी, साख न उस की रहे बहोरी। वचन देय जो करे निरासा, रहे न जग में तस विश्वासा। कर परतिज्ञा सत्य निभावन, सो नर यश भाजन मन पावन। पतित करे नर को अभिमाना, मान त्याग पावे नर माना। कृतघन कपटी स्वारथ साधक, निज अपराधक परहित बाधक। कथन और मन औरहि भावा, हिय में गरल अधर सरसावा। यह लक्षण कपटि के कहिये, ऐसे नर से दूरहि रहिये। कटुता क्रोध छोड़ हस बोले, पीछे बोले पहिले तोले। दोहा गुरु जन का आदर करे, दे उच्चासन मान। कहे नमस्ते जोर कर, बैठे नीचे स्थान।। चौपाई मित भाषण मृदु श्रवणन मीठे, बोले वचन सुमधुर बसीठे। सभा माँझ बैठे अस ठामा, जो निज योग्य होय अभिरामा। जँह ते बहुरि न कोई उठावे, वक्ता वचन सहज सुन पावे। गुण करि ग्रहण दोष कर त्यागे, सज्जन संग कुसंग न लागे। माता पिता गुरु जान समाना, सब की सेवा करे सुजाना। गुरु जन कहें सुनहु हे बालक, सद्गुण सदा रहो तुम पालक। जो दुर्गुण तुम लखहु हमारे, उन को त्यागो रहो नियारे। तैत्तिरीय यह वचन बखाना, दुर्गुण त्याग गहे सद् ज्ञाना। श्लोक यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि।। – तैत्ति० प्र० ७ अनु० ११ काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)