०१३ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (१०) December 14, 2019 By Arun Aryaveer Download प्रथम समुल्लास भाग (१०) तैतिरि ऋषि यह वचन बखाना, नाम अनन्त प्रभु गुणा गाना। सकल पदारथ मँह ‘सत्’ कहिये, सत मँह रहे ‘सत्य’ प्रभु गहिये। जड़ जंगम जाने भगवाना, ताँते प्रभु को संज्ञा ‘ज्ञाना’। जाको नहीं आदि अरु अंता, अपरिमेय भगवान ‘अनंता’। जिस ईश्वर का नहीं कोई आदि, वाको ऋषि मुनि कहे ‘अनादि’। ‘टुनदि’ धातु अर्थ समृद्धि, आनंदमय की होवे सिद्धि। मुक्त जीव जँह पाये अनंदा, सो परमेश्वर शास्त्र प्रवचना। जाको नाश न होय त्रिकाला, सो प्रभु है ‘सत’ संज्ञा वाला। ‘चित’ पद सिद्धी ‘चिति’ ‘संज्ञाने’, चित स्वरूप प्रभु वेद बखाने। वह चेतन सब जगत चेतावे, सत्य झूठ का मान करावे। ब्रह्म सच्चिदानन्द स्वरूपा, अगम अगोचर रूप अनूपा। सो परमातम नित्य कहावे, जन्म न धारे नहीं बिनसावे। ‘शुध’ धातु शुद्धि का बोधक, शुद्ध ब्रह्म सब जग का शोधक। ‘बुध’ अवगमन अर्थ मँह जानहु, बुद्ध रूप परमेश्वर मानहु। बुद्ध विश्व का जानन हारा, बुद्ध प्रभु का सकल पसारा। ‘मुच्लृ’ धातु सों ‘मुक्त’ बनाया, जाँका यश वेदों ने गाया। बंधन रहित मुक्त प्रभु मेरा, भव बन्धन काटे जन केरा। शुद्ध बुद्ध नित मुक्त सुभाऊ, पारब्रह्म राउन को राऊ। ‘मुच्लृ’ धातु अर्थ विमोचन, मुक्त प्रभु है भवभय मोचन। निज भक्तन कहँ मुक्ति दाता, जन रक्षक निर्भय भयत्राता। निर् आ डुकृ९ा् पूरव आवें, निराकार पद शब्द बनावें। निराकार ईश्वर कँह कहिये, जाकी रूप रेख नहीं पहिये। ‘अ९चु’ धातु सों निर्मित अज्जन, निर पूर्वक पुनमया निरंजन। ईश्वर इन्द्रिय गोचर नाँहीं, तातें नाम निरज्जन आहीं। ‘गण’ धातु जानहु संख्याने, गणपति ईश्वर वेद बखाने। जड़ अरु चेतन सबका स्वामी, सो गणेश प्रभु अन्तरयामी। विश्वपति प्रभु है विश्वेश्वर, विश्वनाथ पूरन परमेश्वर। दोहा रह कर अचल अडोल वह, करे सकल व्यवहार। कहें ताहि कूटस्थ प्रभु, ईश्वर जगदाधार। काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)